मुद्दा: खुद को गालियां देकर किसे सशक्त बना रहीं स्त्रियां, क्या सभ्यता की परिभाषा बदल रही है?

दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक आंदोलन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के साथ खत्म हो गया। इसमें शहरी मध्यवर्ग के युवाओं ने खूब भागीदारी निभाई। इनमें बड़ी संख्या में लड़कियां भी थीं। कुछ लोग भारत के दूर-दराज के इलाकों से भी आए थे। जिस बात ने लोगों का सबसे अधिक ध्यान खींचा, वह थी लड़के-लड़कियों द्वारा बेहद अश्लील गालियों का प्रयोग। लड़कियों के ऐसे कपड़े, जो मानो उन्हीं का अपमान करते प्रतीत होते थे। अब तक स्त्री विमर्श गालियों को पुरुष वर्चस्व से जोड़ता रहा है, क्योंकि जितनी भी अश्लील गालियां हैं, वे स्त्रियों के अंग-प्रत्यंग या उनके नाते-रिश्तों से जुड़ी हैं। क्या गालियां देना अब स्त्री सशक्तीकरण की नई पहचान बन गया है लेकिन गाली देने वाली लड़कियों को बहुत से लोगों और अनेक स्त्रियों ने सेलिब्रेट किया। कहा गया कि यह जेन जी (Gen Z) की जेंडर-न्यूट्रल पीढ़ी है। इसे स्त्रियों का असली सशक्तीकरण बताया गया, क्योंकि अब तक जो गालियां वे सुनती आई हैं, अब वही वे खुद दे रही हैं। इससे उनकी ताकत बढ़ रही है। कई लोगों ने लिखा कि उनके दफ्तरों में भी लड़कियां अक्सर गाली देती हैं। अब यह "न्यू नॉर्मल" है। यानी अब यदि मां-बहन की गालियां स्त्रियां दें, तो उसे अपमान नहीं माना जाता। एक लड़की ने कहा कि "इतना तो उसका सैनिटरी पैड भी लीक नहीं होता, जितने पेपर लीक होते हैं।" यही नहीं, इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी तक को नहीं छोड़ा गया। उनके सोशल मीडिया पेज पर जाकर भद्दे-भद्दे कमेंट किए गए। क्या गालियां सिर्फ अपमान हैं या शक्ति प्रदर्शन का माध्यम भी अपने देश में गालियों पर शोध भी हो चुके हैं। समाजशास्त्र कहता है कि गालियां केवल अपमान नहीं होतीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन का माध्यम भी होती हैं। स्त्री से संबंधित जितनी भी गालियां हैं, अब तक पुरुष ही दूसरे पुरुष की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने के लिए उनका इस्तेमाल करते रहे हैं, क्योंकि स्त्री को पुरुष की जागीर और उसकी सत्ता का प्रतीक माना गया। इसी कारण गालियों को पितृसत्ता का औजार कहा जाता है। इन्हें दूसरे के घर की महिलाओं के शरीर और उनकी यौनिकता से जोड़कर प्रयोग किया जाता है। दूसरे को गाली देना यानी उस पर अपना वर्चस्व स्थापित करना। स्त्रियों पर वर्चस्व स्थापित करने और घरेलू हिंसा में भी गालियों का भरपूर इस्तेमाल किया जाता है। अक्सर यह कहकर इसे उचित ठहराया जाता है कि यह केवल गुस्से और आक्रोश को व्यक्त करने का तरीका है। हमारे यहां विवाह जैसे अवसरों पर स्त्रियां गाली-गीत भी गाती हैं। आपसी झगड़ों में भी स्त्रियां खूब गालियां देती हैं। लेकिन यदि ध्यान से देखा जाए, तो वे भी अंततः स्त्रियों को छोटा दिखाने और उनके अपमान से ही जुड़ी होती हैं। क्या शिक्षा और सभ्यता की परिभाषा बदल रही है लंबे समय से कहा जाता रहा है कि गालियां देना असभ्यता की निशानी है। शिक्षा व्यक्ति का परिष्कार करती है और उसे ऐसी भाषा से दूर रहने की सीख देती है, जो किसी का अपमान करे। लेकिन क्या आज वास्तव में ऐसा है फिल्मों, नेटफ्लिक्स और तमाम ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर इन दिनों भरपूर मात्रा में गालियों का इस्तेमाल हो रहा है। सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग में भी इनका खुलकर प्रयोग होता है। जेन जी और जेन अल्फा पीढ़ी इसी माहौल को देखकर बड़ी हो रही है। विमर्शों से उठने वाली चिंताओं को उन्होंने जैसे किनारे कर दिया है और गालियों को ही अपना सबसे मजबूत हथियार बना लिया है। क्या दूसरों की बेटियों का 'बोल्ड' होना हमें इसलिए अच्छा लगता है इसमें एक दिलचस्प बात यह है कि हमें अपने परिवार की स्त्रियां मां, बहन, बेटी या पत्नी गाली देने वाली नहीं चाहिए। लेकिन यदि दूसरों की लड़कियां गाली देती हैं, तो वे हमें अच्छी लगती हैं। क्योंकि प्रकारांतर से स्त्री के मुंह से निकली मां-बहन की गाली पुरुषों की लिबिडो को शांत करती है। क्या समाज दूसरों के बच्चों के बिगड़ने पर ताली बजा रहा है यों भी, दूसरों के बच्चे बिगड़ें तो क्या बुरा! क्योंकि यदि दूसरों की बेटियां गाली देती दिखेंगी, कल वे दफ्तर में अपने बॉस के साथ भी ऐसा करेंगी, तो शायद दफ्तर उनसे जल्द ही मुक्ति पा लेगा। कितना अच्छा होगा, न इसके अलावा यह भी है कि जितने भी कानून हैं जैसे घरेलू हिंसा कानून, पत्नी को गाली देने वाले पतियों के खिलाफ प्रावधान या अश्लीलता से जुड़े कानून—उनकी अब जरूरत ही क्या रह जाएगी जो लोग इन लड़कियों को देखकर ताली बजा रहे हैं, दरअसल वे बहती गंगा में हाथ इसलिए धो पा रहे हैं कि उनके अपने बच्चे, उनकी अपनी बेटियां, यह सब नहीं कर रहीं। वे तो अपना करियर बनाने के लिए महंगे संस्थानों में भारत या विदेश में पढ़ रही हैं। ये भी पढ़ें:पानीपत का तीसरा युद्ध और भाऊनाथ की गद्दी: युद्धभूमि में हुआ दाह संस्कार, लेकिन सांघी की कहानी कुछ और कहती है क्या यही सशक्तीकरण है, जो 24 घंटे भी नहीं टिक पाया एक सच यह भी है कि जिन लड़कियों ने आंदोलन के दौरान खूब गाली-गलौज की, अपने वीडियो बनाए, उनमें से कई अब वीडियो और रील बनाकर माफी भी मांगती फिर रही हैं। आखिर यह कैसी ताकत और कैसा सशक्तीकरण है, जो चौबीस घंटे भी नहीं टिक पाया

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jul 27, 2026, 02:39 IST
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