चुनाव के 75 साल और भरोसे का सवाल: अमृत वर्ष में प्रणाली पर सवाल दुर्भाग्यपूर्ण, सीईसी ज्ञानेश कुमार पर भी आरोप

करीब 75 साल पहले 25 अक्तूबर, 1951 को देश में पहला आम चुनाव शुरू हुआ था। गरीबी, निरक्षरता और विभाजन के घावों से जूझते देश ने जब सभी वयस्कों को मताधिकार देते हुए सरकार चुनने का अधिकार दिया तो यह अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम था। पहले आम चुनाव की शुरुआत के 75 वर्ष पूरे होने का यह अवसर उत्सव का है, लेकिन विडंबना है कि इसकी दहलीज पर चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर सवाल हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर विपक्ष वोट चोरी और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर से सत्तापक्ष को लाभ पहुंचाने के आरोप लगा रहा है। विवाद अब न्यायालय तक पहुंच चुका है। यूं चुनाव आयोग और विवाद का रिश्ता नया नहीं है। साल 2009 में मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने सहयोगी नवीन चावला को कांग्रेस के प्रति कथित पक्षपात के कारण हटाने की सिफारिश की थी। सरकार ने इस सिफारिश को स्वीकार नहीं किया और बाद में चावला मुख्य चुनाव आयुक्त बनाए गए। इसी तरह पूर्व आयुक्तों के राजनीतिक फैसलों ने भी प्रश्न उठाए। चुनाव सुधारों के प्रतीक टी.एन. शेषन ने सेवानिवृत्ति के बाद 1999 में कांग्रेस के टिकट पर गांधीनगर से लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ चुनाव लड़ा था। एम.एस. गिल 2004 में कांग्रेस की तरफ से राज्यसभा पहुंचे और 2008 में मनमोहन सरकार में मंत्री बने। हालांकि इससे उनका पिछला कार्यकाल स्वतः पक्षपाती सिद्ध नहीं होता, लेकिन सार्वजनिक धारणा प्रभावित अवश्य होती है। भारत जैसे विशाल देश में सफलतापूर्वक चुनाव संपन्न कराना चुनाव आयोग के लिए हमेशा एक जटिल और मुश्किल प्रशासनिक काम रहा है। पहले आम चुनाव के समय अलग तरह की समस्याएं थीं। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर इतने बड़े चुनाव का पूर्व अनुभव नहीं था। कई कोशिशों के बावजूद लाखों महिलाएं अपना नाम बताने को तैयार नहीं थीं। इतना ही नहीं, चुनाव में गड़बड़ी की खबरें उस समय भी आई थीं। आलम यह था कि 9 फरवरी, 1952 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन को पत्र लिखकर कहा था कि उन्हें चुनाव संचालन में गड़बड़ी के विषय में कई शिकायतें मिली हैं। बाद के दौर में बाहुबल और बूथ कैप्चरिंग की घटनाएं आम हो गईं। द वर्डिक्ट पुस्तक में दावा है कि एक वक्त ऐसा भी था कि देश के कुल बूथों के 4-5 प्रतिशत बूथ सत्ताधारी दल द्वारा और 2-3 प्रतिशत बूथ विरोधी दलों द्वारा लूट लिए जाते थे। लेकिन ईवीएम आने के बाद पुराने ढंग की बूथ कैप्चरिंग बहुत मुश्किल हो गई। हालांकि चुनाव हारने वाले दलों ने ईवीएम की विश्वसनीयता को लेकर जरूर सवाल खड़े किए, लेकिन ईवीएम से व्यवस्थित चुनावी हेराफेरी का आरोप कभी प्रमाणित नहीं हुआ। 1951 से लेकर 2024 तक ऐसा कोई चुनाव नहीं रहा, जिसमें कुछ पात्र मतदाता वोट डालने से चूके न हों और किसी न किसी स्तर पर चुनावी गड़बड़ी न हुई हो। पहले चुनाव में जहां सिर्फ 17.3 करोड़ मतदाता थे, वहीं 2024 तक उनकी संख्या लगभग 98 करोड़ हो गई। इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत में फ्री एंड फेयर चुनाव की कोशिशें लगातार पुख्ता हुई हैं। लेकिन आज चुनावी गड़बड़ी की कुछ घटनाओं के आधार पर वोट चोरी का एक ऐसा नैरेटिव गढ़ा जा रहा है, जिसकी तह में प्रमाणों का अभाव है। दिलचस्प है कि 2014 और 2019 में जब कांग्रेस इतनी भी सीटें हासिल नहीं कर पाई थी कि उसका नेता औपचारिक नेता प्रतिपक्ष बन सके, तब भी उसने चुनाव आयोग पर ऐसा हमला नहीं बोला था। गौरतलब है कि ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी, 2025 को पद संभाला था। उसके बाद बिहार में बीजेपी-जेडीयू और असम-पश्चिम बंगाल में बीजेपी जीती तो तमिलनाडु में विजय की टीवीके और केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को सत्ता मिली। केरल में तो कांग्रेस ने अकेले 63 सीटें जीतीं, यानी चुनावी परिणाम विपक्ष की जीत असंभव होने की धारणा को चुनौती देते हैं। सच यह है कि आज कांग्रेस को एक ऐसे राष्ट्रीय मुद्दे की जरूरत है, जो कमजोर संगठन के बावजूद उसे व्यापक स्वीकार्यता दे सके। विपक्ष के कुछ और दल भी सरकार को घेरने के लिए एक बड़ा मुद्दा चाहते हैं। लेकिन विपक्षी एकजुटता के राजनीतिक अंतर्विरोध भी कम दिलचस्प नहीं हैं। इसी वर्ष बंगाल के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस के विरुद्ध लड़ रही थी। 25 अप्रैल को श्रीरामपुर की रैली में राहुल गांधी ने ममता बनर्जी पर भाजपा के लिए रास्ता खोलने का आरोप लगाया और दोनों सरकारों के तौर-तरीकों में समानता बताई। कुछ महीनों बाद वही प्रतिद्वंद्वी चुनाव आयोग के विरुद्ध साझा अभियान में साथ खड़े हैं। दरअसल, राजनीति में नैरेटिव प्रभावी होता है। 2024 में विपक्ष ने बीजेपी के चार सौ पार के नारे को संविधान और आरक्षण संबंधी आशंकाओं से जोड़कर उसका बड़ा नुकसान किया। इस बार उसे वोट चोरी के नैरेटिव में यही संभावना दिख रही है। लेकिन सवाल यह है कि चुनाव आयोग का विरोध करते-करते कांग्रेस और उसके सहयोगी कहीं लोकतंत्र की जड़ों पर ही प्रहार करने वाली प्रवृत्तियों को बल तो नहीं दे रहे आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा का बांग्लादेश के आंदोलन से प्रेरणा लेने की बात कहना और प्रशांत भूषण का आंदोलन को रीजीम चेंज की लड़ाई बताना इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। इसी तरह सीजेपी का अभियान भी उद्देश्यों में राजनीतिक है। नीट के छात्रों के अधिकार के लिए शुरू हुई लड़ाई स्कूलों की व्यवस्था सुधारने से होते हुए कुछ महीनों में ही ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग पर टिक गई है। विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह संदेह को साक्ष्य में बदले। किस निर्वाचन क्षेत्र में कितने पात्र मतदाता हटे, कौन-सी प्रविष्टियां गलत थीं और शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई, इन प्रश्नों पर बहस करे। हार को व्यवस्थित चोरी का परिणाम बताने के लिए उसी स्तर का प्रमाण चाहिए, अन्यथा नागरिक के मन में यह धारणा बैठ सकती है कि मतदान व्यर्थ है। इसका नुकसान केवल सत्तारूढ़ दल को नहीं, बल्कि भविष्य में सत्ता परिवर्तन की आशा रखने वाले विपक्ष को भी होगा। साथ ही एक जिम्मेदारी आयोग की है। एसआईआर के संचालन और संवाद में उठे प्रश्नों को केवल राजनीतिक शोर कहकर नहीं टाला जा सकता। नाम हटाने के कारण, पर्याप्त सूचना, सुनवाई, सरल अपील और समयबद्ध निर्णय जरूरी हैं। लेकिन एसआईआर की प्रक्रिया को गैरजरूरी कहना क्या तर्कसंगत है लोकतंत्र का अर्थ है- जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए शासन। भारत में बार-बार यह बात साबित हुई है कि यहां लोकतंत्र की जड़ें बहुत मजबूत हैं और इसका प्रमुख कारण यहां की चुनाव प्रणाली है। लेकिन दुर्भाग्य है कि पहले आम चुनाव की शुरुआत के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर चुनाव प्रणाली पर ही सवाल उठाए जा रहे हैं।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Oct 25, 2026, 02:07 IST
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