तीन गांव, हुगली नदी और 'सिटी ऑफ जॉय': ऐसे बसा कोलकाता; ईस्ट इंडिया कंपनी ने यहां कैसे बढ़ाया अपना व्यापार?

हुगली नदी की धारा आज भी कोलकाता के किनारों को उसी तरह छूती है, जैसे यह सदियों पहले छूती थी। भारत के सबसे ऐतिहासिक, जीवंत और सांस्कृतिक महानगर कोलकाता की शुरुआत बहुत ही छोटे स्तर से हुई थी। आज जिसे हम 'सिटी ऑफ जॉय' कहते हैं, वह पहले केवल तीन छोटे-छोटे गांवों का एक समूह था। तब शायद ही किसी ने यह सोचा होगा कि सुतानुति, गोविंदपुर और कलिकाता नाम के ये तीन गांव आगे चलकर एक विशाल महानगर में बदल जाएंगे। इन गांवों से एक बड़े शहर तक के विकास में हुगली नदी की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण रही है। कोलकाता शहर के विकास और व्यापार को समझना बहुत आसान है। बंगाल की खाड़ी से सीधे जुड़ाव और जलमार्ग की आसान सुविधा ने इस पूरे क्षेत्र को व्यापार के लिए बहुत ही खास बना दिया था। जब 17वीं शताब्दी में यूरोपीय देश भारत में अपना व्यापार बढ़ा रहे थे, तब उनकी नजर हुगली नदी के किनारे बसे इन्हीं तीन गांवों पर पड़ी थी। यहीं से इन गांवों के एक उभरते हुए शहर में बदलने की कहानी शुरू हुई थी। ये भी पढ़ें-Monsoon Update:अंडमान में मानसून की समय से पहले एंट्री, वहीं दिल्ली-यूपी समेत उत्तर भारत में भीषण लू का कहर शहर की स्थापना में जॉब चार्नाक की क्या भूमिका रही जॉब चार्नाक को बहुत लंबे समय तक कोलकाता शहर का संस्थापक माना जाता रहा है। इतिहास के अनुसार, 24 अगस्त 1690 के आसपास वह सुतानुति गांव पहुंचे थे। यहां आकर उन्होंने एक व्यापारिक केंद्र बनाने का काम शुरू किया था। हालांकि, आज के आधुनिक इतिहासकार यह नहीं मानते हैं कि कोलकाता की स्थापना केवल किसी एक व्यक्ति ने की थी। इतिहास की प्रसिद्ध किताब आईन-ए-अकबरी में भी 'कलिकाता' का नाम पहले से ही लिखा हुआ मिलता है, जो इसके पुराने होने का सबूत है। ईस्ट इंडिया कंपनी ने कैसे बढ़ाया अपना व्यापार साल 1698 में अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी ने स्थानीय जमींदार परिवार से इन तीनों गांवों के जमींदारी अधिकार खरीद लिए थे। अधिकार मिलने के बाद कंपनी ने अपना व्यापार और प्रशासनिक ढांचा तेजी से विकसित करना शुरू कर दिया। हुगली नदी के रास्ते पानी के जहाजों से भारी मात्रा में माल ढोने का काम होता था, जिससे व्यापार बहुत तेजी से फैलने लगा। जब नया फोर्ट विलियम बन गया, तो यह इलाका पूरी तरह एक बड़े औपनिवेशिक शहर की शक्ल लेने लगा। ब्रिटिश भारत की राजधानी से सिटी ऑफ जॉय तक का सफर कैसा रहा साल 1772 में वॉरेन हेस्टिंग्स के समय में कोलकाता को ब्रिटिश भारत की राजधानी बना दिया गया था। साल 1911 में अंग्रेजों ने अपनी राजधानी को कोलकाता से हटाकर दिल्ली भेज दिया। राजधानी छिनने के बावजूद कोलकाता देश की बौद्धिक और सांस्कृतिक राजधानी के रूप में अपनी पहचान बना चुका था। यह शहर भारत के साहित्य, शिक्षा और स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे बड़ा केंद्र रहा है और इस शहर ने देश को नई दिशा दिखाई है। रवींद्रनाथ ठाकुर, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर और नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसी महान विभूतियों ने इसी कोलकाता शहर की मिट्टी से प्रेरणा ली थी। समय के साथ इस शहर ने बहुत सी मुश्किलें भी देखी हैं। भीषण अकाल, देश का विभाजन, राजनीति में उथल-पुथल और पैसों की कमी जैसी कई बड़ी चुनौतियों का इस शहर ने डटकर सामना किया है। इतनी बड़ी-बड़ी मुश्किलों के बावजूद इस शहर ने अपनी आत्मा को कभी टूटने नहीं दिया है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: May 18, 2026, 03:02 IST
पूरी ख़बर पढ़ें »




तीन गांव, हुगली नदी और 'सिटी ऑफ जॉय': ऐसे बसा कोलकाता; ईस्ट इंडिया कंपनी ने यहां कैसे बढ़ाया अपना व्यापार? #IndiaNews #National #Kolkata #History #Hooghly #Villages #British #Culture #India #Trade #SubahSamachar