गाजा: तीन साल बाद समंदर की लहरों पर अठखेलियां कर संघर्ष को चुनौती दे रहे नन्हे जीवनरक्षक; कितने बच्चे बिछड़े?

तीन वर्षों से युद्ध का दंश झेल रहे गाजा निपर्स(बाल जीवनरक्षक) एक बार फिर समुद्र तट पर नजर आने लगे हैं। ऑस्ट्रेलिया से शुरू किए गए बाल निपर्स कार्यक्रम में पहले तो 45 बच्चे शामिल थे लेकिन अब 15 बच्चे ही जीवित मिल पाए हैं। माना जा रहा है कि 30 बच्चे या तो लापता हैं या वे अपनी जान गंवा चुके हैं। पीली और काले रंग की 'रैश वेस्ट' (तैराकी की विशेष पोशाक) पहने मुस्कुराते बच्चों का एक छोटा समूह जैसे ही अल-शाती शरणार्थी शिविर के पास मलबे, कचरे और गोलियों के निशानों से भरी कंक्रीट की संकरी गलियों से निकलकर समुद्र तट की ओर बढ़ा, तो हसन अल-हबील के चेहरे पर एक बार फिर खुशी की झलक तैर गई। 40 की उम्र पार कर चुके फलस्तीनी नागरिक हसन अल-हबील ने तीन साल के लंबे अंतराल के बाद पिछले महीने 'गाजा निपर्स' कार्यक्रम की दोबारा शुरुआत की। 'गाजा निपर्स' ऑस्ट्रेलिया के प्रसिद्ध जूनियर सर्फ लाइफ-सेविंग (समुद्री जीवनरक्षक) कार्यक्रम की फलस्तीनी शाखा है। हाल ही में सामने आए वीडियो फुटेज में गाजा के ये छोटे बच्चे और बच्चियां नीले समंदर की लहरों पर सर्फिंग करते, रेत पर खेलते और धूप में नाचते-गाते नजर आए। एजेंसी खुशी के बीच छिपा गहरा दर्द, दवाइयां नहीं मिलीं तो बच्चे ने जान गंवाई गाजा में इस कार्यक्रम की वापसी अल-हबील के लिए जितनी राहत भरी थी, उतनी ही दुखद भी। अल-हबील ने वर्ष 2019-20 की सर्दियों में सिडनी के प्रसिद्ध 'नॉर्थ स्टीन रॉयल सर्फ लाइफसेविंग क्लब' में जीवनरक्षण का प्रशिक्षण लिया था। जान गंवाने वालों में अल-हबील का अपना 15 वर्षीय बेटा अली भी शामिल था। लगातार जारी घेराबंदी और बमबारी के कारण जब खाना और दवाइयां नहीं मिल सकीं, तो अली ने अपने पिता की बाहों में ही दम तोड़ दिया। वह पास के अस्पताल तक भी नहीं पहुंच सका था। बच्चों के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं सिडनी के समुद्र तटों पर वर्ष 2017 में तैयार की गई इस योजना का पहला सत्र वैश्विक महामारी की देरी के बाद वर्ष 2023 के मध्य में शुरू हो पाया था। लेकिन अक्तूबर 2023 में इजरायल और हमास के बीच शुरू हुए भीषण युद्ध के कारण इसे अनिश्चितकाल के लिए रोक देना पड़ा। ये भी पढ़ें:फ्रांस: राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार मेलेंशों ने किया छात्र आंदोलन का समर्थन; क्या युवा बदलेंगे चुनावी समीकरण कार्यक्रम के सह-संस्थापक शमीख बदरा ने गाजा में एक-एक बच्चे का पता लगाने की कोशिश की। बदरा बताते हैं, आज गाजा में कोई भी बच्चा ऐसा नहीं है जो पीड़ित न हो बच्चों के लिए अब कोई भी जगह सुरक्षित नहीं बची है। चुनौतियों को पार कर जगी आशा की किरण कार्यक्रम को दोबारा शुरू करना आसान नहीं था। ऑस्ट्रेलिया से दान में मिले ज़्यादातर सर्फबोर्ड, झंडे और लाइफ-जैकेट या तो गुम हो चुके थे या नष्ट हो गए थे। इसके बाद 'नॉर्दर्न बीचेस कमेटी फॉर फलस्तीन' ने धन जुटाकर गाजा में नया सामान, बॉडी बोर्ड और पीले-काले रंग की पोशाकें भिजवाईं। सुरक्षा भी एक बहुत बड़ी चुनौती थी। युद्धविराम और सुरक्षा की स्थिति का जायजा लेते-लेते आखिरकार 25 सितंबर 2026 का दिन तय किया गया, जब बच्चों को सुरक्षित माहौल में समुद्र तट पर लाया गया।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Oct 12, 2026, 04:06 IST
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