Ghaziabad Korean Love Game Case: 3 बच्चियों की जिंदगी के खेलने वाले Korean Game की कहानी जान लीजिए
एक गेम जो प्यार का वादा करता है, लेकिन अंत में सब कुछ छीन लेता है। मोबाइल स्क्रीन पर चमकती कोरियन भाषा, वर्चुअल पार्टनर की मीठी बातें, रोज़ मिलने वाले टास्क और धीरे-धीरे बनती एक अलग ही दुनिया। बाहर की असली ज़िंदगी फीकी पड़ने लगती है और स्क्रीन के अंदर की दुनिया ही सब कुछ बन जाती है। गाजियाबाद की तीन नाबालिग लड़कियों की दर्दनाक मौत के बाद अब जांच का फोकस इसी खतरनाक वर्चुअल खेल पर है, जिसे पुलिस एक “लव गेम” बता रही है। क्या है यह कोरियन लव गेम यह कोई आम वीडियो गेम नहीं है। यह एक टास्क-आधारित इंटरएक्टिव प्लेटफॉर्म है, जहां खिलाड़ी एक वर्चुअल पार्टनर चुनता है। यह पार्टनर कोरियन भाषा में बात करता है, प्यार भरे मैसेज भेजता है, भावनात्मक जुड़ाव बढ़ाता है और हर दिन नए-नए टास्क देता है। शुरुआत में ये टास्क बेहद आसान और मासूम होते हैं जैसे किसी खास समय पर ऑनलाइन आना, चैट करना, कुछ लिखना या तस्वीरें साझा करना। यहीं से खिलाड़ी धीरे-धीरे एक फैंटेसी वर्ल्ड में फंसता चला जाता है। इस तरह के गेम की सबसे बड़ी ताकत भावनात्मक पकड़ होती है। खिलाड़ी को ऐसा महसूस कराया जाता है कि कोई उसे समझता है, उसकी परवाह करता है और उसके बिना नहीं रह सकता। किशोर उम्र में यह जुड़ाव और भी गहरा हो जाता है। पुलिस जांच में सामने आया है कि इस गेम में खिलाड़ी को यह अहसास दिलाया जाता है कि उसकी असली पहचान से ज़्यादा अहम उसकी “वर्चुअल पहचान” है। कुछ यूज़र खुद को कोरियन नामों से बुलाने लगते हैं, कोरियन संस्कृति को अपनी असली दुनिया मानने लगते हैं और धीरे-धीरे परिवार, पढ़ाई और दोस्तों से कटते चले जाते हैं। शुरुआत में जो टास्क सामान्य लगते हैं, वे आगे चलकर मानसिक दबाव बढ़ाने लगते हैं। समय की पाबंदी, निजी भावनाएं साझा करना, किसी से कुछ छुपाने जैसी बातें शामिल हो सकती हैं। कई मामलों में टास्क पूरे न करने पर खिलाड़ी को डराया जाता है यह कहकर कि अगर उसने बात नहीं मानी तो उसका वर्चुअल रिश्ता टूट जाएगा या उसे अकेला छोड़ दिया जाएगा। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, यही डर और भावनात्मक ब्लैकमेल इस गेम को बेहद खतरनाक बना देता है। जांच में यह भी सामने आया है कि ऐसे गेम्स की लत कोरोना लॉकडाउन के दौरान तेजी से बढ़ी। लंबे समय तक घर में बंद रहने, स्कूल बंद होने और सोशल इंटरैक्शन कम होने से बच्चे मोबाइल की दुनिया में ज्यादा समय बिताने लगे। एक बार जब यह गेम रोजमर्रा की दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है, तो इससे बाहर निकलना बेहद मुश्किल हो जाता है। पढ़ाई छूटने लगती है, नींद का पैटर्न बिगड़ जाता है और असली दुनिया बोझ लगने लगती है। पुलिस और साइबर एक्सपर्ट इस गेम की तुलना पहले सामने आ चुके खतरनाक ऑनलाइन चैलेंजेस से कर रहे हैं। फर्क बस इतना है कि यहां डर से ज्यादा “प्यार” का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन अंत में परिणाम उतने ही गंभीर हो सकते हैं। ऐसे गेम्स बच्चों के दिमाग पर इस कदर असर डालते हैं कि वे सही-गलत, सुरक्षित-असुरक्षित का फर्क करना बंद कर देते हैं। यह मामला सिर्फ एक शहर या एक परिवार तक सीमित नहीं है। यह एक चेतावनी है हर उस घर के लिए, जहां बच्चे घंटों मोबाइल स्क्रीन में डूबे रहते हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बच्चों की डिजिटल गतिविधियों पर नजर रखना, उनसे बातचीत करना और अचानक मोबाइल छिनने या सख्त पाबंदियों के बजाय संवाद का रास्ता अपनाना बेहद जरूरी है। क्योंकि कभी-कभी एक गेम सिर्फ गेम नहीं रहता। वह बच्चों की सोच, पहचान और पूरी दुनिया पर कब्जा कर लेता है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Feb 04, 2026, 18:26 IST
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