शहरों को यों बदरंग न होने दें: ये केवल बाजार नहीं, बल्कि साझा सांस्कृतिक स्थल
शहरों और सड़कों पर होर्डिंग लगाने की नीति आज भी अधिकांश नगरों में नहीं है। स्थानीय प्रशासन और शहरी निकायों की प्रभावी नीति के अभाव में बेतरतीब लगे होर्डिंग शहरी अव्यवस्था, सौंदर्य-ह्रास और अतिक्रमण का प्रतीक बन चुके हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड जैसे राज्यों में राष्ट्रीय व राज्य राजमार्गों से लेकर नगरों के प्रमुख चौराहों तक बड़े-बड़े होर्डिंग शहरों और सड़कों को बदरंग कर रहे हैं। एक ओर इनसे अव्यवस्था बढ़ती है, तो दूसरी ओर सड़क सुरक्षा पर इसका सीधा असर पड़ता है। कई चौराहों पर लगे होर्डिंग आवागमन के दृश्य को ढक देते हैं, मोड़ पर ट्रैफिक देखने में बाधा बनते हैं और कभी-कभी तेज हवा या जर्जर ढांचे के कारण टूटकर सड़क पर गिर जाते हैं, जिसके चलते दुर्घटनाएं होती हैं। ये होर्डिंग कभी व्यावसायिक विज्ञापन होते हैं, तो कई बार खुलेआम आत्म-प्रचार का माध्यम। सार्वजनिक स्थानों का इस तरह निजी या राजनीतिक प्रचार के लिए उपयोग (वह भी बिना किसी समुचित स्थान-निर्धारण के) स्थानीय प्रशासन की कमजोरी और लापरवाही को उजागर करता है। सरकारी और स्वतंत्र अध्ययनों के अनुसार, भारत में आउट-ऑफ-होम विज्ञापन उद्योग का आकार लगभग 4,000 से 5,000 करोड़ रुपये आंका जाता है, जिसमें बड़ा हिस्सा महानगरों और हिंदी पट्टी के राज्यों से आता है। अकेले उत्तर प्रदेश में नगर निगमों की कुल आय का 8–12 प्रतिशत हिस्सा विज्ञापन कर और लाइसेंस शुल्क से प्राप्त होता है। कई शहरों में हर एक से 1.5 किलोमीटर पर औसतन 10–15 छोटे-बड़े होर्डिंग दिखाई देते हैं। सड़क परिवहन मंत्रालय और ट्रैफिक पुलिस की रिपोर्टें बताती हैं कि शहरी दुर्घटनाओं के 5–7 प्रतिशत मामलों में दृश्य बाधा (विजुअल ऑब्सट्रैक्शन) एक सहायक कारण होती है, जिसमें अनधिकृत होर्डिंग, फ्लेक्स और बैनर शामिल हैं। सौंदर्य की दृष्टि से देखें, तो होर्डिंग शहरों के स्थापत्य और सांस्कृतिक परिदृश्य को ढक देते हैं। ऐतिहासिक इमारतों, नदी-तटों, फ्लाईओवरों तथा स्कूल-अस्पतालों के आसपास लगे विज्ञापन न केवल नियमों का उल्लंघन करते हैं, बल्कि नागरिकों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डालते हैं। मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में यह सामने आया है कि अत्यधिक दृश्य व शोर तनाव और ध्यान-भंग को बढ़ाता है। हिंदी पट्टी के कई शहरों में त्योहारों और चुनावों के समय लगाए गए अस्थायी होर्डिंग और बैनर बाद में स्थायी समस्या बन जाते हैं, क्योंकि इन्हें हटाने की कार्रवाई या तो देर से होती है या होती ही नहीं। इसकी एक बड़ी वजह शहरी निकायों की राजस्व-निर्भरता है। ज्यादातर नगर निगम विज्ञापन शुल्क को आसान आय मानते हैं। इसलिए नियमों के सख्त पालन में रुचि नहीं दिखाई देती। अधिकांश शहरों में विज्ञापन नीति होने के बावजूद जोनिंग, आकार, ऊंचाई, सामग्री और दूरी के मानक कागजों में ही धरे रह जाते हैं। डिजिटल और एलईडी होर्डिंग की तेज चमक और लगातार बदलती छवियां रात में दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ाती हैं। इनसे ऊर्जा की खपत भी अधिक होती है। राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि रैलियों, नेताओं के आगमन या अन्य आयोजनों के अवसर पर वे शहरों की सड़कों और चौराहों को होर्डिंग, झंडों और बैनरों से पाटकर बदरंग न करें। मनमाने होर्डिंग से मुक्ति का रास्ता बहु-स्तरीय और व्यावहारिक होना चाहिए। पहला, हर शहर में स्पष्ट विज्ञापन-जोनिंग लागू की जाए। स्कूलों, अस्पतालों, विरासत स्थलों, प्रमुख चौराहों, डिवाइडरों, धार्मिक स्थलों और आवासीय क्षेत्रों के आसपास होर्डिंग पर पूर्ण प्रतिबंध हो। दूसरा, आकार और संख्या की स्पष्ट सीमा तय की जाए; प्रति किलोमीटर अधिकतम होर्डिंग की संख्या और कुल विज्ञापन क्षेत्र निर्धारित हो। तीसरा, सभी होर्डिंग के लिए पारदर्शी ई-लाइसेंसिंग और सार्वजनिक डैशबोर्ड बनाया जाए, ताकि नागरिक देख सकें कि कौन-सा होर्डिंग वैध है और कितने समय के लिए। चौथा, डिजिटल और एलईडी होर्डिंग पर सख्त नियंत्रण हो—चमक (निट्स), फ्रेम-रेट और संचालन समय की सीमा तय की जाए तथा रिहायशी इलाकों में रात के समय इन्हें बंद रखा जाए। पांचवां, नगर निकायों के लिए वैकल्पिक राजस्व स्रोत विकसित किए जाएं, ताकि वे विज्ञापन पर अत्यधिक निर्भर न रहें। छठा, नागरिक भागीदारी को कानूनी बल दिया जाए—अनधिकृत होर्डिंग की शिकायत पर 72 घंटे में कार्रवाई अनिवार्य हो और जुर्माने का एक हिस्सा वार्ड सुधार कोष या शिकायतकर्ता से जुड़े नागरिक कार्यों में लगे। शहर केवल बाजार नहीं, बल्कि साझा सांस्कृतिक स्थल हैं। होर्डिंग-मुक्त या संतुलित होर्डिंग वाली सड़कें न सिर्फ सुंदर दिखती हैं, बल्कि अधिक सुरक्षित, शांत और मानवीय भी। यदि हिंदी पट्टी के शहर नियम, तकनीक और नागरिक चेतना को साथ लेकर चलें, तो फिर से बदरंग सड़कों की पहचान, इतिहास और सौंदर्य को लौटाया जा सकता है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Feb 03, 2026, 04:04 IST
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