जाएं तो जाएं कहां: स्कूलों में बालिकाओं के शौचालय के आंकड़ों में भले सुधार दिखाएं, लेकिन जमीनी हकीकत में अलग

हाल ही में राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने वहां के मुख्य सचिव को स्कूलों में स्वच्छता को लेकर कड़ी फटकार लगाई-'आप स्वच्छता मिशन की बात करते हैं, लेकिन स्कूल में बच्चियों के लिए टॉयलेट नहीं बनवा पा रहे हैंअफसरों को शर्म आनी चाहिए कि बच्चियां इसलिए पानी नहीं पी पातीं, क्योंकि स्कूल में टॉयलेट्स नहीं हैं और वे वहां जा नहीं सकतीं। ऐसे में अदालत बच्चों व समाज को जवाब नहीं दे पा रही है।' इसी तरह हरियाणा के स्कूलों में शौचालयों की हालत पर पिछले साल आई पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की यह टिप्पणी भी गौरतलब है-सरकार कोर्ट के सामने सिर्फ आंकड़ों का खेल खेल रही है। धरातल पर कोई काम नहीं कर रही।' हाईकोर्ट ने हरियाणा शिक्षा विभाग पर पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाते हुए एक हफ्ते के अंदर सरकारी स्कूलों में मूलभूत सुविधाओं की पूर्ति के लिए योजना पेश करने का आदेश दिया था। यह केवल राजस्थान या हरियाणा की स्थिति नहीं है। शिक्षा के लिए एकीकृत जिला सूचना प्रणाली प्लस (यूडीआईएसई +) की 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार, देश के 14.71 लाख स्कूलों में से 39,729 में छात्राओं के लिए शौचालय की सुविधा नहीं है। हरियाणा में 767 स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग शौचालय या तो हैं नहीं या फिर इस्तेमाल करने लायक नहीं हैं। पंजाब में 188 स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं हैं और 191 स्कूलों में शौचालय काम नहीं कर रहे हैं। चंडीगढ़, दिल्ली और गोवा में 100 प्रतिशत स्कूलों में छात्राओं के लिए शौचालय होने की सूचना दी गई है, जबकि यह आंकड़ा पंजाब में 99.5, हिमाचल में 99, उत्तर प्रदेश में 98.3, हरियाणा में 97.3 और उत्तराखंड में 94.3 प्रतिशत है। राष्ट्रीय स्तर पर कुल 97.4 प्रतिशत स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय परिसर में हैं। कागजों पर ये आंकड़े आश्वस्त करने वाले हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति वैसी नहीं है। अगर तीन प्रतिशत स्कूलों में भी बालिकाओं को इस स्थिति से गुजरना पड़ता है कि जाएं तो जाएं कहां तो यह छात्राओं की बहुत बड़ी संख्या के साथ अन्याय है। स्कूलों में बालिकाओं के लिए केवल शौचालय बनाना ही पर्याप्त नहीं है, वहां साफ-सफाई भी होनी चाहिए, अन्यथा, यह उनकी सेहत से खिलवाड़ है। स्वच्छ विद्यालय और समग्र शिक्षा जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रम स्कूलों में पानी, साफ-सफाई के मानकों को अनिवार्य करते हैं, जिसमें शौचालय निर्माण, हाथ धोने की सुविधा और तय समय पर सफाई पर जोर दिया जाता है। फिर भी पूरे देश में सरकारी स्कूलों में सफाई कर्मचारियों के स्वीकृत पद बड़े पैमाने पर दिखाई नहीं देते हैं। अक्सर उन्हें अन्य कर्मचारी जैसी अस्पष्ट श्रेणियों में रखा जाता है और ये पद ज्यादातर खाली रहते हैं। नतीजा यह कि शौचालय बन जाने के बावजूद वे इस्तेमाल लायक नहीं रहते। इसका असर लड़कियों के स्वास्थ्य और स्कूल में उनके बने रहने पर पड़ता है। स्कूल शिक्षा और साक्षरता के केंद्रीय सचिव ने मुख्य सचिवों को लिखे पत्र में कहा कि कई स्कूलों में शौचालय इस्तेमाल करने लायक नहीं हैं या हैं ही नहीं, जिससे लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं। इसलिए प्रधानमंत्री ने सौ फीसदी स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग शौचालय बनाने का जो लक्ष्य दिया है, उसे आठ मार्च से पहले पूरा करने में तत्परता दिखाएं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस यानी आठ मार्च दूर नहीं है मगर इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो यह काम इतना दुरूह भी नहीं है। यहां राजस्थान हाईकोर्ट की टिप्पणी पर फिर गौर करना चाहिए कि रात भर में कई जगह सड़कें तैयार हो जाती हैं, लेकिन बच्चों के लिए शौचालयों की व्यवस्था नहीं हो पाती।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Feb 06, 2026, 03:33 IST
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