जानना जरूरी है: कैसे हुआ यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार? नारद जी के शाप और श्रीकृष्ण की लीला से जुड़ा है आख्यान

श्रीकृष्ण और संकर्षण (बलराम), घुटनों के बल चलने लगे थे। बचपन से ही दोनों भाइयों के बीच गहरा स्नेह था। उनका उठना-बैठना, सोना, खाना और खेलना सब साथ-साथ होता था। दोनों का वेष भी एक जैसा होता और उनकी दिनचर्या भी लगभग समान रहती थी। उनकी बाल-लीलाएं पूरे ब्रज को आनंद से भर देती थीं। कभी वे घुटनों के बल सरकते हुए धूल में लिपट जाते, तो कभी बछड़ों के बीच जाकर खेलने लगते और उनके शरीर तथा सिर के बालों में गोबर तक लग जाता। दोनों भाई खेलकूद में इतने मग्न रहते कि पूरे ब्रज में घूमते और नंद भी उन्हें हर समय रोक नहीं पाते थे। उनकी चंचलता और निश्छल हंसी देखकर ब्रजवासी अपने सारे कामकाज भूलकर उन्हें निहारते रहते। एक दिन यशोदा मैया कृष्ण से नाराज हो गईं। उन्होंने कृष्ण के पेट से लेकर कमर तक में रस्सी लपेटकर उन्हें एक भारी ओखली से बांध दिया। फिर, यशोदा मैया घर के काम में लग गईं। कुछ देर बाद श्रीकृष्ण ओखली को घसीटते हुए आंगन से बाहर चल पड़े। उनके मार्ग में दो विशाल अर्जुन वृक्ष खड़े थे। श्रीकृष्ण ओखली खींचते हुए दोनों वृक्षों के बीच से निकलने लगे। ओखली वृक्षों के बीच में फंस गई। श्रीकृष्ण ने थोड़ा जोर लगाकर ओखली को खींचा, तो दोनों वृक्ष जड़ से उखड़ गए और धरती पर गिर पड़े। यह दृश्य देखकर आसपास खड़े लोग घबरा गए, किंतु बाल कृष्ण भयभीत होने के बजाय हंस रहे थे। गोपियां तुरंत यशोदा मैया के पास दौड़ी गईं और घबराकर बोलीं, यशोदा जी! जल्दी चलिए। आपके पुत्र के ऊपर अर्जुन वृक्ष गिर पड़े हैं। वह ओखली में बंधा हुआ वृक्षों के बीच खड़ा है। हमें तो समझ में नहीं आ रहा कि वह जीवित कैसे बच गया! उनकी बातें सुनकर यशोदा जी का हृदय भय से कांप उठा। वह तुरंत उस स्थान पर पहुंचीं और देखा कि श्रीकृष्ण सकुशल खड़े हैं तथा ओखली अब भी उनके उदर से बंधी हुई है। यशोदा जी ने अपने पुत्र को सुरक्षित देखकर राहत की सांस ली। पूरे ब्रजवासियों के मन में एक ही प्रश्न था कि इतने छोटे बालक ने कमर में बंधी साधारण-सी ओखली को आखिर ऐसे कैसे खींचा कि दो विशाल अर्जुन वृक्ष धराशायी हो गए। वृक्षों के गिरने के बाद उनमें से दो दिव्य पुरुष प्रकट हुए। उनके शरीर से अद्भुत तेज निकल रहा था और मुख पर शाप से मुक्ति की प्रसन्नता स्पष्ट दिखाई दे रही थी। तब लोगों को समझ आया कि यह श्रीकृष्ण की लीला थी, जिसके द्वारा उन्होंने कुबेर के दो पुत्रों नलकूबर और मणिग्रीव को शाप से मुक्त किया था। दरअसल, नलकूवर और मणिग्रीव भगवान शिव के भक्त थे, पर भौतिक संपन्नता ने उन्हें अहंकारी बना दिया था। एक दिन उन्होंने प्रमादवश झील में स्नान कर रही कुछ युवतियों के साथ अशिष्ट व्यवहार किया। नारद मुनि वहां से गुजर रहे थे। धन और अहंकार के मद में चूर नलकूबर और मणिग्रीव नारद मुनि को देखकर भी नग्न खड़े रहे। यह देखकर नारद जी ने उन दोनों को वृक्ष बनकर जड़ होने का शाप दे दिया। दोनों ने क्षमा मांगी, तब नारद जी ने उन्हें कहा कि भगवान कृष्ण के हाथों उनका उद्धार होगा और वे शाप से मुक्त होंगे। नारद जी के इसी शाप के चलते नलकूबर और मणिग्रीव अर्जुन वृक्ष बन गए और दोनों यमलार्जुन कहलाए। फिर वे माता यशोदा के प्रांगण में कृष्ण के दर्शन की प्रतीक्षा करते रहे। इस प्रकार भगवान कृष्ण ने लीला करके कुबेर के पुत्रों नलकूबर और मणिग्रीव को उखाड़कर उन्हें नारद मुनि के शाप से मुक्त कर दिया। उद्धार हो जाने के उपरांत नलकूबर और मणिग्रीव अपने वास्तविक स्वरूप में आ गए तथा कृतज्ञता व्यक्त करके अपने धाम को लौट गए। ब्रजवासियों को भी धीरे-धीरे समझ में आ चुका था कि श्रीकृष्ण कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि उनके भीतर ईश्वर-प्रदत्त असाधारण शक्तियां छिपी थीं। उनके लिए वह नंद और यशोदा के प्रिय पुत्र थे, पर उनकी प्रत्येक बाल लीला के पीछे मानो किसी महान दिव्य उद्देश्य की छाया दिखाई देती थी।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Sep 20, 2026, 05:19 IST
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