भावनाओं नहीं, संभावनाओं का गठबंधन: यूरोप को भी भारत की उतनी ही जरूरत; गोयल के छह दिन के दौरे से क्या हासिल?
व्यापार के मैदान को अखाड़ा बना चुके अमेरिका के अप्रत्याशित रुख के बीच केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल का जर्मनी और नीदरलैंड का छह दिन का दौरा एक बात साफ कर गया। यह रिश्ता अब याचक और दाता का नहीं, बराबरी की जरूरत का है। जितनी जरूरत भारत को यूरोप की तकनीक और बाजार की है, उतनी ही जरूरत सुस्त पड़ती रफ्तार, बूढ़ी होती आबादी और बढ़ती लागत से जूझ रहे यूरोप को भारत के इंजन की है। यूरोप का ग्रोथ इंजन जर्मनी हो या प्रवेश द्वार नीदरलैंड, हर मेज पर यही सुर सुनाई दिया कि यह भावनाओं का नहीं, संभावनाओं का गठबंधन है। भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते पर दस्तखत से करीब 60 दिन पहले हुई इस कवायद ने वह जमीन तैयार की है, जिस पर कागज की रियायतें कारखानों और ऑर्डर बुक तक पहुंचेंगी। यूरोप को भारत क्यों चाहिए आंकड़े खुद यह कहानी कहते हैं। यूरोप की विकास दर इस साल आधे से एक फीसदी के बीच सिमटने का अनुमान है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने जुलाई में यूरो क्षेत्र की 2026 की विकास दर 0.9 फीसदी और जर्मनी की 0.7 फीसदी आंकी, जबकि डॉयचे बैंक ने यूरो क्षेत्र और जर्मनी, दोनों के लिए यह अनुमान घटाकर 0.5 फीसदी कर दिया है। इसके उलट गोयल ने भरोसा जताया कि भारत इस साल साढ़े सात फीसदी की रफ्तार से बढ़ेगा। रफ्तार के साथ हाथों की भी कमी है। एक अध्ययन के मुताबिक जर्मनी को हर साल कम से कम 2,88,000 विदेशी कामगार चाहिए, वरना 2040 तक उसका कार्यबल 10 फीसदी घट सकता है। जर्मनी ने भारतीयों के लिए कुशल कामगार वीजा का कोटा 20,000 से बढ़ाकर सालाना 90,000 कर दिया है और वहां काम करने वाले भारतीयों की संख्या 2015 के 23,320 से बढ़कर 2024 में 1,36,670 हो गई। गोयल ने बर्लिन में यही कहा कि जर्मनी 2022 के आवाजाही समझौते के तहत भारत से लोग भेजने को कह रहा है, नर्सों, देखभालकर्ताओं और आईटीआई प्रशिक्षित युवाओं की वहां भारी मांग है। रफ्तार के साथ हाथों की भी कमी है। एक अध्ययन के मुताबिक जर्मनी को हर साल कम से कम 2,88,000 विदेशी कामगार चाहिए, वरना 2040 तक उसका कार्यबल 10 फीसदी घट सकता है। जर्मनी ने भारतीयों के लिए कुशल कामगार वीजा का कोटा 20,000 से बढ़ाकर सालाना 90,000 कर दिया है और वहां काम करने वाले भारतीयों की संख्या 2015 के 23,320 से बढ़कर 2024 में 1,36,670 हो गई। गोयल ने बर्लिन में यही कहा कि जर्मनी 2022 के आवाजाही समझौते के तहत भारत से लोग भेजने को कह रहा है, नर्सों, देखभालकर्ताओं और आईटीआई प्रशिक्षित युवाओं की वहां भारी मांग है। यूरोप की जुबानी यह बात सिर्फ भारतीय पक्ष नहीं कह रहा। हेग में डच कारोबारी जगत के प्रतिनिधि ने माना कि भारत ऐसे विशाल अवसर देता है, जो दुनिया में और कहीं मिलना मुश्किल है। रॉटरडैम बंदरगाह के प्रमुख बौदेविन सीमन्स ने कहा कि यूरोप भारत के साथ ज्यादा से ज्यादा कारोबार करने को उत्सुक है। डच विदेश व्यापार मंत्री शूर्ड शूर्डस्मा की बात सबसे मार्के की रही। उन्होंने कहा कि दुनिया पर नजर डालें तो शायद उम्मीद की ज्यादा वजह नहीं दिखती, पर यूरोप-भारत और नीदरलैंड-भारत रिश्तों को देखें तो उम्मीद की बहुत वजहें हैं। असल परीक्षा अबदौरे ने माहौल बना दिया, पर असली परीक्षा अब है। पहली कसौटी रफ्तार की है। अगले साल की शुरुआत में समझौता लागू होने तक भारतीय कारोबारियों को नमूने, गुणवत्ता और कीमतें तय कर लेनी होंगी। दूसरी कसौटी कार्बन कर है, जिस पर यूरोप झुकने को तैयार नहीं, इसलिए भारतीय स्टील, एल्युमिनियम और सीमेंट को कार्बन घटाने की दौड़ तेज करनी होगी। तीसरी कसौटी लालफीताशाही है, जिसे दोनों तरफ के मंत्रियों ने माना है। चौथी कसौटी प्रतिभा का संतुलन है। जर्मनी को भारतीय हाथ चाहिए, पर गोयल खुद कह चुके हैं कि असली चुनौती अपने लोगों को भारत वापस लाने की है, और युवा शोधकर्ताओं ने उनसे साफ कहा कि उन्हें लौटने के लिए पैसा नहीं, माहौल चाहिए।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Oct 29, 2026, 02:32 IST
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