Trade Deal: भारत-अमेरिका व्यापार समझौता, कृषि व डेयरी क्षेत्र के हितों से समझौता नहीं करने के क्या हैं मायने?
भारत में कृषि सिर्फ आर्थिक गतिविधि नहींबल्कि जीवनशैली है व घरेलू अर्थव्यवस्था के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्र है। कृषि एवं पशुपालन से जुड़ी गतिविधियों देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, जो 70 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देती है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में कृषि जहां अत्यधिक मशीनीकरण और कॉरपोरेट आधारित है, वहीं भारत में यह जीवनयापन एवं आजीविका का सवाल है। वैश्विक खाद्य व्यापार का 90 फीसदी से अधिक हिस्सा करीब पांच बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण में है, जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से आक्रामक मूल्य निर्धारण रणनीतियों का इस्तेमाल किया है। अपने किसानों को भारी सब्सिडी देने वाले विकसित देशों की इन कंपनियों को भारत अगर कृषि आयात शुल्क में छूट देता है, तो देश में सस्ते अनाज और उत्पादों की बाढ़ आ सकती है। इससे भारतीय किसानों की आय और आजीविका पर गंभीर असर पड़ेगा। ज्यादा बाजार चाहते हैं विकसित देश भारत अनाज उत्पादन में काफी हद तक आत्मनिर्भर है, जबकि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ जैसे देशों के लिए कृषि एक बड़ा व्यापारिक उद्योग है। बड़े पैमाने पर मशीनी खेती एवं भारी सरकारी सब्सिडी से अमेरिका और अन्य विकसित देश भारत को अपने निर्यात विस्तार के लिए आकर्षक बाजार मानते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में अमेरिका का कृषि निर्यात 176 अरब डॉलर का रहा, जो उसके कुल वस्तु निर्यात का करीब 10 फीसदी है। ये भी पढ़े:-यूरोप के बाद अमेरिका से करार: रोजगार समेत इन क्षेत्रों को मिलेगा बढ़ावा, कितनी बदलेगी भारत की आर्थिक तस्वीर इसलिए, संवेदनशील क्षेत्र है कृषि देश की 50 फीसदी से अधिक आबादी कृषि पर निर्भर है। इसलिए, भारत पूरे कृषि क्षेत्र को संवेदनशील मानता है। विशेष रूप से मुख्य फसलों, दूध और प्रमुख कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क ग्रामीण आजीविका के लिए बेहद अहम हैं। उच्च शुल्क से मिलता है संरक्षण भारत का कृषि क्षेत्र फिलहाल मध्यम से ऊंचे शुल्क या आयात शुल्क और नियमों के जरिये संरक्षित है, ताकि घरेलू किसानों को अनुचित प्रतिस्पर्धा से बचाया जा सके। किसी क्षेत्र को खोलने का मतलब आयात प्रतिबंध और शुल्क कम करना होता है। भारत कृषि क्षेत्र की सुरक्षा के लिए शून्य से 150 फीसदी तक का शुल्क लगाता है। अमेरिका भी कुछ कृषि उत्पादों पर ऊंचे शुल्क लगाता है, जैसे तंबाकू पर 350 फीसदी। विशेषज्ञों का कहना है, अमेरिका जटिल नॉन-एड वैलोरेम (एनएवी) शुल्क भी लगाता है, जिससे आयात महंगा हो जाता है। इस तथ्य को व्यापार चर्चाओं में अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। भारत का कृषि निर्यात मूल्य के आधार पर भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कृषि उत्पादक है, लेकिन वैश्विक कृषि निर्यात में उसकी हिस्सेदारी सिर्फ 2.2 फीसदी है, जो 2000 में 1.1 फीसदी थी। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का कुल कृषि निर्यात बढ़कर 51 अरब डॉलर से अधिक पहुंच गया, जो 2023-24 में 45.7 अरब डॉलर था। इसमें से करीब पांच अरब डॉलर का निर्यात अमेरिका को किया गया। ये भी पढ़े:-अमेरिका से डील की कीमत: रूस से तेल की खरीद कम करेगा भारत, क्या बदल रही देश की ऊर्जा नीति; समझिए इसके मायने भारत का लक्ष्य 2024-25 में भारत का कुल निर्यात 437 अरब डॉलर रहा। भारत ने अगले चार वर्ष में कृषि, समुद्री उत्पाद और खाद्य-पेय पदार्थों के संयुक्त निर्यात को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। प्रमुख निर्यात उत्पादों में चाय, कॉफी, चावल, कुछ अनाज, मसाले, काजू, तेल खली, तिलहन, फल और सब्जियां शामिल हैं। डब्ल्यूटीओ के नियम और भारत भारत के कृषि शुल्क विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन नहीं करते। नियम सदस्य देशों को खाद्य सुरक्षा एवं ग्रामीण रोजगार से जुड़े संवेदनशील क्षेत्रों की रक्षा की अनुमति देते हैं, जो भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। अमेरिका का कृषि निर्यात-सब्सिडी भारत को अमेरिका का कृषि निर्यात 2024 में 1.6 अरब डॉलर रहा। प्रमुख निर्यातों में छिलके रहित बादाम (86.8 करोड़ डॉलर), पिस्ता (12.1 करोड़ डॉलर), सेब (2.1 करोड़ डॉलर) और इथेनॉल/एथाइल अल्कोहल (26.6 करोड़ डॉलर) शामिल हैं। व्यापार विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिका अपने कृषि क्षेत्र को भारी सब्सिडी देता है और पिछले कुछ वर्षों मे यह उत्पादन मूल्य के 50 फीसदी से भी ज्यादा रही है। अमेरिका चावल पर 82 फीसदी, कैनोला पर 61 फीसदी चीनी पर 66 फीसदी, कपास पर 74 फीसदी, मोहायर पर 141 फीसदी व ऊन पर 215 फीसदी सब्सिडी देता है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Feb 05, 2026, 04:16 IST
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