New AI Study: सिर्फ 10 मिनट का इस्तेमाल और... क्या एआई हमें आलसी बना रहा है? नई रिसर्च में बड़ा खुलासा
आजकल हम सभी इंटरनेट यूजर्स किसी न किसी रूप में एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का इस्तेमाल कर ही रहे हैं। हम भले ही यह कहें कि हम चैटजीपीटी, जेमिनी, क्लाउड या ग्रोक जैसे बॉट्स से बस थोड़ी मदद ले रहे हैं, लेकिन सच तो यह है कि यह हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं। ईमेल लिखने से लेकर, शेड्यूल बनाने, तस्वीरें जनरेट करने और यहां तक कि लंबे आर्टिकल्स को शॉर्ट में समझने तक एआई टूल्स पर हमारी निर्भरता बढ़ती जा रही है। लेकिन, अमेरिका और ब्रिटेन की टॉप यूनिवर्सिटीज (कार्नेगी मेलन, MIT, ऑक्सफोर्ड और UCLA) के रिसर्चर्स की एक नई स्टडी ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। इस रिसर्च के मुताबिक, सिर्फ 10 मिनट तक एआई का इस्तेमाल भी आपकी खुद से सोचने-समझने और फैसले लेने की क्षमता को कम कर सकता है। क्या एआई हमें आलसी बना रहा है इस स्टडी के दौरान शोधकर्ताओं ने कुल 1,222 लोगों पर तीन अलग-अलग प्रयोग किए। इसमें प्रतिभागियों को गणित और रीडिंग कॉम्प्रिहेंशन से जुड़े कुछ विशेष टास्क दिए गए। इन लोगों को मुख्य रूप से दो समूहों में बांटा गया था। पहले ग्रुप ने अपने सभी टास्क बिना किसी बाहरी मदद के पूरी तरह खुद से हल किए, जबकि दूसरे ग्रुप को एडवांस एआई असिस्टेंट की सुविधा दी गई। शुरुआती नतीजों में जैसा कि अनुमान था, एआई की मदद लेने वाला ग्रुप काफी तेज और सटीक साबित हुआ। उन्होंने न केवल कम समय में काम खत्म किया बल्कि ज्यादा सही जवाब भी दिए। हालांकि, इस पूरी रिसर्च का सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया, जब इस ग्रुप के पास से एआई का सपोर्ट अचानक हटा लिया गया। एआई का सपोर्ट छीनने पर क्या हुआ रिसर्च के नतीजों से यह साफ हुआ कि जैसे ही यूजर्स से एआई का सपोर्ट छीना गया, उनकी परफॉर्मेंस में अचानक भारी गिरावट देखने को मिली। उदाहरण के तौर पर, मैथ्स टेस्ट में जहां बिना एआई वाले ग्रुप ने करीब 73% सवाल सही हल किए। वहीं एआई पर निर्भर रहने वाले लोग इसके बिना सिर्फ 57% तक ही पहुंच पाए। यही ट्रेंड रीडिंग टास्क में भी नजर आया, जहां एआई की आदत वाले यूजर्स मुश्किल सवालों को हल करने के बजाय उन्हें छोड़ने लगे। रिसर्चर्स का मानना है कि असल चिंता सिर्फ कम स्कोर की नहीं, बल्कि लोगों में 'डटे रहने की क्षमता' का कम होना है। दरअसल, तुरंत जवाब पाने की आदत ने लोगों को मुश्किल चुनौतियों के लिए मानसिक मेहनत करने और दिमागी कसरत करने से दूर कर दिया है। तो क्या एआई बुरी चीजहै इस सवाल का जवाब सीधा 'हां' नहीं है। स्टडी यह नहीं कहती कि एआई टूल्स अपने आप में नुकसानदायक हैं; असली बात यह है कि हम उनका इस्तेमाल कैसे करते हैं। इस्तेमाल का तरीका असर सिर्फ गाइडेंस के लिए: हिंट, फॉर्मूला या किसी टॉपिक को समझने के लिए एआई का इस्तेमाल करना। सुरक्षित: ऐसे यूजर्स की सोचने की क्षमता में कोई कमी नहीं देखी गई। पूरा काम सौंप देना: एआई से सीधे फाइनल जवाब मांगना या पूरा टास्क उसी से करवाना। नुकसानदायक: ऐसे यूजर्स के सोचने-समझने और प्रॉब्लम-सॉल्विंग स्किल में गिरावट आई। यह फर्क बहुत मायने रखता है। एआई को अपना 'थिंकिंग पार्टनर' मानना अच्छा है। लेकिन इसे अपने खुद के दिमाग का 'रिप्लेसमेंट' बना लेना खतरनाक है। 'बॉयलिंग फ्रॉग' इफेक्ट से की तुलना रिसर्चर्स ने इस स्थिति की तुलना 'बॉयलिंग फ्रॉग' इफेक्ट से की है। जैसे अगर एक मेंढक को पानी में रखकर धीरे-धीरे गर्म किया जाए तो उसे खतरे का अहसास नहीं होता। ठीक उसी तरह, एक या दो बार एआई से पूरा काम करवा लेना कोई बड़ी बात नहीं लगती। लेकिन लगातार ऐसा करने से धीरे-धीरे इंसान की गहरी सोच और मुश्किलों को हल करने की आदत खत्म होने लगती है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: May 09, 2026, 11:56 IST
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