Aligarh News: जिले में बढ़ रही 700 से 900 ग्राम के नवजातों की संख्या

मोहनलाल गौतम जिला महिला चिकित्सालय में इन दिनों बेहद कम वजन के बच्चों का जन्म मां-बाप और डॉक्टरों की चिंता बढ़ा रहा है। इस अस्पताल में एक महीने में लगभग 950 प्रसव हो रहे हैं, जिसमें 150 ऑपरेशन से हो रहे हैं। तकरीबन 95 फीसदी महिलाएं प्री मैच्योर (समय से पहले) बच्चों को जन्म दे रही हैं। इनमें से कई बच्चों का वजन मात्र 700 से 900 ग्राम तक ही रहता है।चिकित्सकों के अनुसार, जिले में हर वर्ष लगभग एक लाख पांच हजार बच्चों का जन्म होता है। इनमें से करीब 21,000 बच्चे कम वजन के पैदा हो रहे हैं। कम वजन वाले बच्चों की संख्या लगभग 20 फीसदी तक पहुंच चुकी है। मोहनलाल गौतम जिला महिला चिकित्सालय के सी-पेप यूनिट में इन दिनों ऐसे पांच बच्चे उपचाराधीन हैं। इनके मां-बाप दिन-रात उनकी जान बचने की प्रार्थना करते रहते हैं। देखभाल में पूरी ताकत लगा रहे हैं।पंडित दीनदयाल उपाध्याय संयुक्त चिकित्सालय में भी हाल ही में 700 ग्राम वजन का बच्चा भर्ती था, जिसे अब छुट्टी मिल चुकी है। इस बच्चे का जन्म मलखान सिंह जिला अस्पताल में हुआ था। हालात बिगड़ने पर यहां भर्ती कराया गया था। इस अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड में इन बच्चों के लिए छह छोटे बेड हैं। जिसमें इस वक्त हाथरस से आए 1200 ग्राम, हरदुआगंज से आए 1300 ग्राम, क्वार्सी से आए 1300 ग्राम और अकराबाद से आए 1600 ग्राम के नवजात भर्ती हैं। दो अन्य कम वजन के बच्चों का यहां उपचार चल रहा है।ऐसे बच्चों को सांस लेने में बड़ी परेशानी होती है क्योंकि कम वजन के कारण उनके फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं होते। इनकी देखभाल महिला अस्पताल की सी-पेप (कंटीन्यूअस पॉजिटिव एयरवे प्रेशर) यूनिट में की जा रही है ताकि उन्हें बचाया जा सके। सीपेप यूनिट एक जीवन रक्षक प्रणाली है जो बिना वेंटिलेटर के शिशुओं को सांस लेने में मदद करती है। ऐसी स्थिति में अस्पताल की नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) में स्थापित सीपेप यूनिट ही मददगार बनती है। इन बच्चों को यहां पर सात दिन तक भर्ती रखा जाता है। स्थिति ठीक होने पर छुट्टी दे दी जाती है। हालत बिगड़ने पर जेएन मेडिकल कॉलेज रेफर किया जाता है।कम वजन वाले बच्चों की तीन श्रेणियांजिले में हर वर्ष पैदा हो रहे 21,000 कम वजन वाले बच्चों को बचाना किसी चुनौती से कम नहीं है। इन बच्चों को तीन श्रेणियों में बांटा जाता है। इसमें एलबीडब्ल्यू (लो बर्थ वेट), वीएलबीडब्ल्यू (वेरी लो बर्थ वेट) और ईएलबीडब्ल्यू (एक्सट्रिमली वेरी लो बर्थ वेट) श्रेणी शामिल है। श्रेणियों के अनुसार ही बच्चों का उपचार किया जाता है। ईएलबीडब्ल्यू श्रेणी के बच्चों को बचाना डॉक्टरों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन रही है।एलबीडब्ल्यू (लो बर्थ वेट) : जन्म के समय वजन डेढ़ से ढाई किलो (1500 से 2400 ग्राम) के बीच। ऐसे बच्चों की संख्या लगभग 10 फीसदी तक हो गई है।वीएलबीडब्ल्यू (वेरी लो बर्थ वेट) : जन्म के समय वजन एक किलो से डेढ़ किलो (1000 से 1499 ग्राम) के बीच। ऐसे बच्चों की संख्या छह फीसदी तक पहुंच गई है।ईएलबीडब्ल्यू (एक्सट्रिमली वेरी लो बर्थ वेट) : जन्म के समय वजन एक किलो (1000 ग्राम से 700 ग्राम) से भी कम। ऐसे बच्चों की संख्या चार फीसदी तक पहुंच गई है जो सबसे चिंताजनक है।ये कारण बन रहे वजहघरेलू कलह और मानसिक तनाव।रोजाना पौष्टिक भोजन का अभाव।वायु और जल प्रदूषण का असर।कम उम्र में शादी और बच्चे का जन्म।दो बच्चों के बीच तीन साल का अंतर न होना।हाल ही में अस्पताल में 700 ग्राम वजन के बच्चे का उपचार कर उसका जीवन बचाया गया है। ऐसी परिस्थितियां बहुत जटिल होती हैं। मां-बाप यदि ध्यान नहीं देंगे तो यह समस्या बढ़ती चली जाएगी। ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ रही है।-डॉ. केके शर्मा, बाल रोग विशेषज्ञ, पंडित दीनदयाल उपाध्याय संयुक्त चिकित्सालय।गर्भवती महिलाओं को पौष्टिक आहार और अच्छा वातावरण देना बहुत जरूरी है। मानसिक तनाव नहीं होना चाहिए। गर्भधारण की उम्र और अन्य परिस्थितियां भी जिम्मेदार होती हैं, इसलिए इसका ध्यान रखना होगा।डॉ. किशोर माथुर, बाल रोग विशेषज्ञ, पंडित मोहन लाल गौतम जिला महिला चिकित्सालय।जिले में हर वर्ष कम वजन वाले 21 हजार बच्चों का जन्म हो रहा है, जो चिंताजनक है। इन बच्चों को उपचार से बचाया जा रहा है। मां-बाप को गर्भधारण से बच्चे के जन्म लेने तक विशेष ध्यान रखने की जरूरत है।डॉ. आरएन सिंह, मुख्य चिकित्सा अधिकारी, अलीगढ़।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Nov 02, 2026, 02:57 IST
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