PAK के कब्जे वाले कश्मीर में असंतोष: जनांदोलन अब महज स्थानीय सियासी विवाद नहीं, क्या कहती हैं पीओके की आवाजें?
पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) या पीओके में पिछले कुछ सप्ताह से जारी जनांदोलन अब केवल एक स्थानीय राजनीतिक विवाद नहीं रह गया है। यह आंदोलन पाकिस्तान के उस आधिकारिक नैरेटिव को चुनौती देने लगा है, जिसे इस्लामाबाद दशकों से अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने प्रस्तुत करता रहा है। जून में शुरू हुआ यह आंदोलन प्रारंभ में 45 सदस्यीय विधानसभा की 12 आरक्षित सीटों के विरोध तक सीमित था, पर अब यह आर्थिक उपेक्षा, राजनीतिक अधिकारों, प्रशासनिक जवाबदेही और क्षेत्र की वास्तविक स्वायत्तता जैसे व्यापक मुद्दों का प्रतीक बन गया है। आज यह आंदोलन इस सवाल को भी सामने ला रहा है कि क्या पीओजेके के लोग वास्तव में उस राजनीतिक व्यवस्था से संतुष्ट हैं, जिसे पाकिस्तान आजाद जम्मू-कश्मीर के रूप में पेश करता है। इस आंदोलन की शुरुआत जम्मू-कश्मीर ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) की उस मांग से हुई, जिसमें विधानसभा की उन 12 आरक्षित सीटों को समाप्त करने की बात कही गई, जो 1947 के बाद पाकिस्तान गए जम्मू-कश्मीर शरणार्थियों के लिए सुरक्षित हैं। आंदोलनकारियों का तर्क है कि ये प्रतिनिधि पीओजेके में रहते ही नहीं हैं, फिर भी वहां की राजनीति और सरकार के गठन को प्रभावित करते हैं। इससे स्थानीय जनता का लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व कमजोर होता है और इस्लामाबाद के सत्ता प्रतिष्ठान को क्षेत्र की राजनीति में हस्तक्षेप का अवसर मिलता है। हाल ही में क्षेत्र के सर्वोच्च न्यायालय ने इन सीटों को सांविधानिक संरक्षण प्राप्त होने की बात कही, लेकिन इस निर्णय से विवाद समाप्त नहीं हुआ। इसके विपरीत, आंदोलन और अधिक व्यापक होता चला गया। पिछले कई वर्षों से पीओजेके में महंगाई, बेरोजगारी, बिजली की ऊंची दरें, सब्सिडी वाले आटे की कमी और विकास की धीमी गति जैसे मुद्दे लगातार लोगों को प्रभावित कर रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन क्षेत्रों में बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं हैं और जहां से पाकिस्तान के अन्य हिस्सों को बिजली उपलब्ध कराई जाती है, वहीं के लोगों को बिजली के सर्वाधिक बिल चुकाने पड़ते हैं। लोगों को यह भी शिकायत है कि क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों का लाभ स्थानीय आबादी को नहीं मिलता, जबकि विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापन और पर्यावरणीय नुकसान का बोझ उन्हें ही उठाना पड़ता है। यही आर्थिक असंतोष धीरे-धीरे राजनीतिक असंतोष में बदल गया। जेएएसी का उदय भी इसी बदलती राजनीतिक चेतना का परिणाम है। यानी आर्थिक समस्याओं ने लोगों को केवल राहत की मांग तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्होंने शासन की पूरी संरचना पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। पाकिस्तान सरकार ने इस आंदोलन से संवाद स्थापित करने के बजाय मुख्यतः दमन का रास्ता अपनाया। जेएएसी पर आतंकवाद निरोधी कानूनों के तहत प्रतिबंध लगा दिया गया, उसके नेताओं और समर्थकों को गिरफ्तार किया गया, इंटरनेट और मोबाइल सेवाओं पर पाबंदियां लगाई गईं और हजारों पुलिस व अर्धसैनिक बलों को तैनात कर दिया गया। इसके बावजूद आंदोलन कमजोर नहीं पड़ा, बल्कि लोगों के भीतर असंतोष और गहरा गया। हाल के दिनों में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई झड़पों में कई लोगों की जान गई है। बढ़ती हिंसा ने राजनीतिक संकट को और गंभीर बना दिया है। जेएएसी के नेता पाकिस्तान के दशकों पुराने आधिकारिक नैरेटिव को खुलकर चुनौती दे रहे हैं। रावलाकोट में आयोजित एक विशाल जनसभा में आंदोलन के प्रमुख नेता सरदार अमन खान ने कहा कि यह क्षेत्र 'न तो आजाद है और न ही विवादित, बल्कि पाकिस्तान के कब्जे वाला क्षेत्र है।' यह बयान आधिकारिक कहानी पर सीधी चोट है, जिसके माध्यम से पाकिस्तान लंबे समय से स्वयं को कश्मीरियों के अधिकारों का समर्थक और आत्मनिर्णय का पक्षधर बताता रहा है। सार्वजनिक मंचों से दिए जाने वाले ऐसे बयानों को अब बड़ी संख्या में लोगों का समर्थन भी मिल रहा है। हाल के दिनों में पाकिस्तान विरोधी नारे लगातार सुनाई दिए और प्रदर्शनकारियों ने खुले तौर पर कहा कि पाकिस्तान ने इस क्षेत्र का राजनीतिक और आर्थिक शोषण किया है। आंदोलन के नेताओं का आरोप है कि प्रशासन ने कई हफ्ते तक खाद्य सामग्री और दवाओं की आपूर्ति बाधित कर दी, जिससे मानवीय संकट उत्पन्न हो गया। उन्होंने नियंत्रण रेखा के पार रहने वाले लोगों तथा भारत से भी सहायता की अपील की। यदि किसी क्षेत्र के लोग अपने ही प्रशासन से निराश होकर बाहरी सहायता की मांग करने लगें, तो यह शासन व्यवस्था पर गहरे अविश्वास का संकेत माना जाएगा। यूनाइटेड कश्मीर पीपुल्स नेशनल पार्टी सहित कई स्थानीय संगठनों ने सुरक्षा बलों द्वारा कथित अत्यधिक बल प्रयोग, मनमानी गिरफ्तारियों, जबरन गुमशुदगी, संचार प्रतिबंध और नागरिक स्वतंत्रताओं के हनन की स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग की है। उन्होंने विभिन्न देशों व अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से तथ्य खोजने वाले स्वतंत्र मिशन भेजने का आग्रह किया है। जाहिर है, स्थानीय आंदोलन अब अपने मुद्दों को वैश्विक स्तर पर उठाने की कोशिश कर रहा है। भारत ने भी कहा है कि पीओजेके में जारी आंदोलन पाकिस्तान द्वारा दशकों से किए जा रहे राजनीतिक शोषण, मौलिक अधिकारों के दमन और प्रशासनिक अत्याचार का परिणाम है। विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान पर नागरिकों के खिलाफ बल प्रयोग, आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति रोकने और इंटरनेट बंद कर लोगों की आवाज दबाने का आरोप लगाया है। बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और अन्य क्षेत्रों की तरह पीओजेके में भी लोग व्यापक राजनीतिक भागीदारी, संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण और जवाबदेह शासन की मांग कर रहे हैं। यह व्यापक असंतोष इस बात का संकेत है कि केवल सुरक्षा बलों के सहारे राजनीतिक स्थिरता लंबे समय तक बनाए नहीं रखी जा सकती। क्षेत्र में होने वाले विधानसभा चुनावों ने इस संकट को और संवेदनशील बना दिया है। पीओजेके की वर्तमान स्थिति यह स्पष्ट करती है कि राजनीतिक वैधता केवल सांविधानिक प्रावधानों, प्रशासनिक नियंत्रण या सुरक्षा बलों की मौजूदगी से स्थापित नहीं होती। किसी भी शासन की स्थिरता का आधार जनता का विश्वास, लोकतांत्रिक भागीदारी और उत्तरदायी प्रशासन होता है। यदि लोगों की राजनीतिक आकांक्षाओं, आर्थिक शिकायतों और लोकतांत्रिक अधिकारों की मांगों की लगातार अनदेखी की जाती है, तो यह असंतोष और गहरा होता जाएगा।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Jul 18, 2026, 04:17 IST
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