तीन पड़ाव, एक संदेश: हिंद-प्रशांत में बढ़ती कूटनीतिक ताकत, भरोसेमंद साझेदार के रूप में उभरता भारत
ऐसे समय में, जब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता छोटे और मझोले देशों को नए रणनीतिक साझेदार तलाशने के लिए प्रेरित कर रही है और पश्चिम एशियाई संकट के मद्देनजर वैश्विक व्यापार, समुद्री सुरक्षा और आपूर्ति शृंखलाओं के नए समीकरण आकार ले रहे हैं, तब प्रधानमंत्री मोदी की इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की यात्रा इस पूरे क्षेत्र में भारत को एक निर्णायक, विश्वसनीय और संतुलनकारी शक्ति के रूप में स्थापित करने के लिहाज से बेहद अहम है। दरअसल, पिछले एक दशक में भारत की विदेश नीति में सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि अब वह बहुआयामी कूटनीति को प्राथमिकता देते हुए हिंद-प्रशांत से लेकर यूरोप, पश्चिम एशिया और अफ्रीका तक अपने रणनीतिक संबंधों को एक नई दिशा दे रहा है। प्रधानमंत्री मोदी की तीन देशों की यात्रा इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है। इंडोनेशिया दक्षिण पूर्व एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के साथ-साथ आसियान का सर्वाधिक प्रभावशाली सदस्य भी है। पश्चिम एशिया में जारी संकट ने दुनिया को यह दिखाया है कि समुद्री व्यापारिक मार्ग सामरिक दृष्टि से कितने अहम हो सकते हैं। इंडोनेशिया का साबांग पोर्ट मलक्का जलसंधि के बिल्कुल मुहाने पर स्थित है, जहां से दुनिया का करीब चालीस फीसदी समुद्री व्यापार और चीन का 80 प्रतिशत से अधिक आयात गुजरता है। ऐसे समय में, जब चीन पाकिस्तान के ग्वादर, श्रीलंका के हंबनटोटा और म्यांमार के बंदरगाहों के विकास में सहभागी बना हुआ है, भारत का इंडोनेशिया के साथ समुद्री सहयोग अहम हो जाता है। उल्लेखनीय है कि दोनों देशों के बीच हुए अन्य समझौतों के साथ फिलीपीन और वियतनाम के बाद भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने वाला इंडोनेशिया तीसरा देश भी बन गया है। ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत के रिश्तों को देखें, तो दोनों देश क्वाड के सदस्य हैं और मुक्त, समावेशी तथा नियम-आधारित हिंद-प्रशांत व्यवस्था के समर्थक हैं। रक्षा अभ्यासों से लेकर खुफिया सहयोग, साइबर सुरक्षा, सेमीकंडक्टर, दुर्लभ खनिज और स्वच्छ ऊर्जा तक दोनों देशों के बीच सहयोग लगातार बढ़ रहा है। अब कोशिश एक संतुलित समग्र आर्थिक सहयोग समझौते (सीईसीए) को अंतिम रूप देने की होगी। न्यूजीलैंड अपेक्षया छोटी अर्थव्यवस्था जरूर है, लेकिन हिंद-प्रशांत की बदलती रणनीति में उसका बड़ा महत्व है। दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौते के कुछ महीनों बाद हो रही यह यात्रा 40 वर्षों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली द्विपक्षीय यात्रा होगी। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जब सभी देश सहयोग के विकल्प तलाश रहे हैं, तब भरोसेमंद साझेदारियां अहम हो जाती हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा से हिंद प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति तो मजबूत होगी ही, दुनिया को यह संदेश भी जाएगा कि वह साझा समृद्धि का सबसे विश्वसनीय साझेदार बनने की क्षमता रखता है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Jul 09, 2026, 03:06 IST
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