ईरान पर प्रतिबंधों को लेकर संयुक्त राष्ट्र में टकराव: रूस और चीन का अमेरिकी प्रस्ताव पर वीटो, ट्रंप को झटका

रूस और चीन ने गुरुवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के उस प्रस्ताव पर वीटो कर दिया, जिसमें ईरान पर फिर से लगाए गए प्रतिबंधों की निगरानी जारी रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों को अधिकृत करने की मांग की गई थी। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रतिबंध अभी लागू हैं। इनके तहत विदेशों में ईरान की संपत्तियां फ्रीज करना, तेहरान के साथ हथियारों के सौदों पर रोक और ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम के किसी भी विकास पर प्रतिबंध समेत कई उपाय शामिल हैं। ईरान पर कैसे लगाया गया था प्रतिबंध 2015 में ईरान और फ्रांस, जर्मनी व ब्रिटेन समेत प्रमुख शक्तियों के बीच हुए परमाणु समझौते में मौजूद प्रावधान का इस्तेमाल करते हुए इन तीन यूरोपीय देशों ने 'स्नैपबैक' प्रक्रिया शुरू की थी। इसके बाद 27 सितंबर 2025 को सुरक्षा परिषद के प्रतिबंध फिर लागू हो गए थे। इसके साथ ही सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध समिति को बहाल किया गया और प्रतिबंधों के पालन की निगरानी के लिए संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों के एक पैनल को अधिकृत किया गया। अमेरिका ने रखा था क्या प्रस्ताव अमेरिका ने विशेषज्ञ पैनल का कार्यकाल एक साल बढ़ाने के लिए प्रस्ताव तैयार किया था। यह प्रस्ताव ऐसे समय आया जब अमेरिका ईरान को उसके बचे हुए आर्थिक साझेदारों से अलग-थलग करने के लिए व्यापक अभियान भी चला रहा है। ईरान में छह महीने से अधिक समय से जारी युद्ध के गतिरोध में पहुंचने के बीच यह प्रस्ताव 11-2 मतों से खारिज हो गया। सोमालिया और पाकिस्तान ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। रूस और चीन के वीटो के कारण प्रस्ताव पारित नहीं हो सका। जून 2025 में इस्राइल और अमेरिका की ओर से ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले के बाद से संयुक्त राष्ट्र के परमाणु निरीक्षक ईरान के समृद्ध यूरेनियम भंडार की स्थिति की पुष्टि नहीं कर पाए हैं। संयुक्त राष्ट्र के परमाणु निगरानी संगठन के अनुसार, ईरान के पास 60 प्रतिशत तक शुद्धता वाला 440.9 किलोग्राम यानी 972 पाउंड समृद्ध यूरेनियम था। यह 90 प्रतिशत हथियार-ग्रेड स्तर तक पहुंचने से पहले की एक तकनीकी प्रक्रिया है। ईरान ने किसे बताया सनकी ईरान के संयुक्त राष्ट्र मिशन ने चीन और रूस को प्रस्ताव पर वीटो करने के लिए धन्यवाद दिया। मिशन ने सोशल मीडिया पर कहा कि दोनों देशों ने अमेरिका और उसके सहयोगियों की ओर से सुरक्षा परिषद का अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने की 'एक और सनकी कोशिश' को रोक दिया। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की उप राजदूत जेनिफर लोकेटा ने कहा कि अमेरिका को वीटो की उम्मीद थी, क्योंकि विशेषज्ञ ईरान और उसके सहयोगियों के बीच प्रतिबंधित सहयोग को उजागर कर सकते थे।उन्होंने कहा कि वीटो प्रतिबंधों की विशेषज्ञ निगरानी को रोकने के व्यापक प्रयास का हिस्सा हैं। उन्होंने यह भी कहा कि विशेषज्ञ पैनल के सदस्यों की नियुक्ति को रोककर उन गतिविधियों से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग को दबाने की कोशिश की जा रही है, जो प्रतिबंधित शासन का समर्थन करती हैं। रूस के वीटो ने क्या बदला मार्च 2024 में रूस के वीटो के बाद परमाणु कार्यक्रम को लेकर उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंधों की संयुक्त राष्ट्र निगरानी समाप्त हो गई थी। माली में प्रतिबंध खत्म कर दिए गए। लोकेटा ने कहा कि यमन और मध्य अफ्रीकी गणराज्य में विशेषज्ञों की नियुक्तियां भी टाली गईं या अस्वीकार की गईं।ईरान के लिए विशेषज्ञों के पैनल को एक साल पहले अधिकृत किया गया था और महासचिव एंतोनियो गुटेरेस ने सदस्यों के नाम भी प्रस्तावित किए थे, लेकिन उन्हें कभी मंजूरी नहीं मिली। लोकेटा ने कहा, 'स्वतंत्र विशेषज्ञ पैनल के बिना यह परिषद प्रतिबंधों के उल्लंघन पर निष्पक्ष और सबूत आधारित रिपोर्टिंग के अपने मुख्य स्रोत से वंचित हो जाती है। इससे निगरानी में ऐसा अंतर पैदा होता है, जिसका फायदा केवल ईरानी शासन और प्रतिबंधों से बचने वालों को होता है।' रूस ने ईरान पर लगे प्रतिबंधों को बताया अवैध संयुक्त राष्ट्र में रूस के राजदूत वासिली नेबेंजिया ने मॉस्को के इस दावे को दोहराया कि ईरान पर 'स्नैपबैक' के तहत प्रतिबंध लगाना अवैध था। उन्होंने कहा कि विशेषज्ञ पैनल का कार्यकाल बढ़ाने का प्रस्ताव 'गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण' था और उसका कोई कानूनी आधार नहीं था।नेबेंजिया ने कहा कि रूस और चीन ने अमेरिका तथा उसके सहयोगियों से प्रस्ताव को मतदान के लिए नहीं रखने का आग्रह किया था, क्योंकि इससे सुरक्षा परिषद में तनाव बढ़ता। उनके मुताबिक, वॉशिंगटन ने 'टकराव का रास्ता चुनने' का फैसला किया। वर्तमान में सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष फ्रांस के संयुक्त राष्ट्र राजदूत जेरोम बोनाफोंट ने कहा कि प्रतिबंधों को लागू करना 'ईरान को उसके परमाणु दायित्वों पर लौटने के लिए प्रोत्साहित करने का महत्वपूर्ण साधन' है। उन्होंने कहा कि फ्रांस प्रतिबंधों को लागू कराने के तरीके पर विचार करेगा।एक विकल्प उत्तर कोरिया के विशेषज्ञ पैनल को समाप्त किए जाने के बाद अपनाए गए तरीके जैसा हो सकता है। इसके तहत फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और अमेरिका को शामिल करके एक निगरानी दल बनाया जा सकता है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Sep 18, 2026, 05:35 IST
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