यूजीसी: सिर्फ अच्छे इरादे काफी नहीं, सवालों से गुजरते हुए क्रियान्वयन पर नजर

हाल ही में, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा अधिसूचित उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु विनियमन को यदि केवल उसके नाम व प्रस्तावना के आधार पर देखा जाए, तो वह एक स्वागतयोग्य पहल प्रतीत होता है। उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव के प्रश्न लंबे समय से चर्चा में रहे हैं। ऐसे में, यह स्वाभाविक है कि सरकार प्रयास करे कि विश्वविद्यालय परिसरों में समानता, सुरक्षा और सम्मान का वातावरण सुनिश्चित किया जाए। पर अच्छे इरादे अपने आप में पर्याप्त नहीं होते। सवाल हमेशा यह होता है कि इरादों को किस भाषा, किस संरचना और किस प्रक्रिया के माध्यम से संस्थागत रूप दिया गया है। इस विनियमन की प्रस्तावना में कहा गया है कि यूजीसी धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म-स्थान और दिव्यांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है। पर प्रस्तावना से आगे बढ़ने और उद्देश्य से संबंधित प्रावधान पढ़ने पर भाषा का स्वर बदलने लगता है। उद्देश्य वाली धारा में कहा गया है कि यह विनियमन विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और दिव्यांगजनों के विरुद्ध भेदभाव को खत्म करने के लिए बनाया गया है। यहां विशेष रूप से शब्द पूरे विनियमन की दिशा निर्धारित करता है। यहां पहला बुनियादी प्रश्न पैदा होता है कि यदि भेदभाव की समस्या को व्यापक रूप में स्वीकार किया गया है, तो उद्देश्य कुछ निश्चित सामाजिक श्रेणियों तक सीमित क्यों है अधिकांश प्रावधान इसी उद्देश्य की व्याख्या व क्रियान्वयन के रूप में सामने आते हैं। भेदभाव की परिभाषा वाले प्रावधान में कहा गया है कि धर्म, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या दिव्यांगता के आधार पर किया गया कोई भी अनुचित या पक्षपातपूर्ण व्यवहार भेदभाव माना जाएगा। यह परिभाषा देखने में संतुलित और समावेशी है, पर उद्देश्य व परिभाषा के बीच यह अंतर असहज स्थिति पैदा करता है। विनियमन के एक केंद्रीय स्तंभ समान अवसर का फोकस वंचित समूहों पर है। यहां सवाल उठता है कि समता क्या केवल कुछ समूहों के लिए विशेष व्यवस्थाएं करके हासिल की जा सकती है या उसके लिए पूरे शैक्षणिक समुदाय को समान रूप से संबोधित करना आवश्यक है। किसी छात्र को शोध-निर्देशक न मिलना, किसी शोधार्थी को पर्याप्त समय न दिया जाना या किसी युवा शिक्षक की बात को विभागीय बैठकों में गंभीरता से न लिया जाना, जैसी स्थितियां किसी आरक्षित या अनारक्षित श्रेणी से जुड़ी न होकर भी असमानता का अनुभव कराती हैं। समिति को भेदभाव की शिकायतों की जांच करने, रिपोर्ट तैयार करने और कार्रवाई की अनुशंसा करने का अधिकार दिया गया है। समिति की संरचना से जुड़े प्रावधान में कहा गया है कि उसमें अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, दिव्यांगजन और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। यहां प्रश्न प्रतिनिधित्व का नहीं, बल्कि जांच करने वाली संस्था की प्रकृति का है। विनियमन में कहीं यह स्पष्ट नहीं किया गया कि समिति की संरचना में विचारों का संतुलन कैसे सुनिश्चित किया जाएगा। समता समिति को अधिकार दिया गया है कि वह भेदभाव वाले कृत्यों की एक उदाहरणात्मक सूची तैयार करे। इसका अर्थ यह है कि सूची सीमित नहीं होगी और उसके बाहर के व्यवहार भी समिति की व्याख्या के आधार पर भेदभाव की श्रेणी में आ सकते हैं। यदि भेदभाव की सीमा स्पष्ट न हो तथा वह परिस्थितियों व व्याख्या पर निर्भर हो, तो असमंजस की स्थिति पैदा हो सकती है। प्रावधानों के अनुसार, कोई भी पीड़ित व्यक्ति भेदभाव की शिकायत ऑनलाइन पोर्टल, लिखित आवेदन या समता हेल्पलाइन के जरिये दर्ज करा सकता है। साथ ही, यदि शिकायतकर्ता चाहे, तो उसकी पहचान गोपनीय रखी जाएगी। लेकिन, जब किसी व्यक्ति पर आरोप लगाया जाता है और आरोप लगाने वाले की पहचान सामने नहीं आती, तो आरोपित पक्ष के लिए स्थिति जटिल हो जाती है। विनियमन में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि गोपनीयता और निष्पक्ष सुनवाई के बीच यह संतुलन किस तरह साधा जाएगा। शिकायत प्राप्त होने के बाद समता समिति को 24 घंटे के भीतर बैठक करने का प्रावधान है। कई बार शिकायतें लंबे समय से चले आ रहे तनाव, गलतफहमी या अधूरी जानकारी का परिणाम होती हैं। ऐसे मामलों में जल्दबाजी समाधान को कठिन बना सकती है। समिति को मामले की सूचना पुलिस को देने का भी प्रावधान है। यह प्रावधान विनियमन को एक प्रशासनिक व्यवस्था से आगे ले जाकर अर्ध-दंडात्मक ढांचे में बदल देता है। यहां प्रश्न उठता है कि क्या हर शैक्षणिक विवाद या व्यवहारगत असहमति को इस स्तर तक ले जाना जरूरी है क्योंकि कक्षा, मूल्यांकन या मार्गदर्शन से जुड़े कई विवाद ऐसे होते हैं, जिन्हें संवाद और मध्यस्थता से सुलझाया जा सकता है। विनियमन कहता है कि परिसर में भेदभाव की रोकथाम और निगरानी के लिए समता समूह गठित किए जाएंगे, जो संवेदनशील स्थानों का निरीक्षण करेंगे। हर इकाई, विभाग, छात्रावास में एक समता दूत नामित किया जाएगा, जो किसी भी उल्लंघन की सूचना देगा। इनका उद्देश्य सतर्कता और सुरक्षा बताया गया है। हालांकि, यदि यह डर बना रहे कि कोई भी बात बाद में भेदभाव के रूप में व्याख्यायित की जा सकती है, तो शिक्षक और छात्र, दोनों ही जोखिम लेने से बचने लगते हैं। विनियमन में किसी संस्थान द्वारा प्रावधानों का पालन न करने पर कठोर दंड का भी प्रावधान है। इसके बावजूद, उल्लंघन की प्रकृति और दंड के बीच स्पष्ट संबंध स्थापित नहीं किया गया है। नतीजतन, संस्थान जोखिम से बचने की नीति अपनाने लगते हैं। इस पूरे विनियमन में सामान्य या गैर-परिभाषित समूहों के अनुभवों पर बहुत कम स्पष्टता है। इससे यह धारणा बन सकती है कि कुछ लोग संरक्षित हैं और कुछ केवल निगरानी और दायित्व के दायरे में आते हैं। ऐसी धारणा विश्वविद्यालयों के भीतर सामाजिक संतुलन को प्रभावित कर सकती है। स्पष्ट है कि यह विनियमन केवल भेदभाव-निरोधक दस्तावेज नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालयों के आंतरिक जीवन को पुनर्गठित करने की भी क्षमता रखता है। यह पुनर्गठन किस दिशा में जाएगा, यह केवल नियमों से नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन के तरीके से तय होगा। यदि क्रियान्वयन संवाद, संवेदनशीलता और विवेक के साथ होता है, तो यह सकारात्मक भूमिका निभा सकता है। पर यदि वह भय, औपचारिकता और अति-सावधानी को बढ़ावा देता है, तो परिणाम अपेक्षा के विपरीत हो सकते हैं। इसी बिंदु पर विनियमन पर चर्चा की जरूरत है, जो विरोध या समर्थन के बजाय समझ के लिए होनी चाहिए। विश्वविद्यालयों का काम केवल नियमों का पालन करना नहीं, बल्कि समाज को सोचने, सवाल करने व संतुलन की क्षमता देना भी है। यदि समता का विनियमन इस क्षमता को मजबूत करता है, तो वह अपने उद्देश्य में सफल होगा और यदि उसे सीमित करता है, तो उस पर पुनर्विचार अपरिहार्य होगा। - edit@amarujala.com

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jan 29, 2026, 04:21 IST
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