जब अनिश्चितता ही एकमात्र सत्य: अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव की मांग, पक्ष-विपक्ष को गंभीरता से विचार करना होगा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सादगी और संयम का उपदेश देकर लोगों की सामाजिक चेतना को जगाया। बढ़ती कीमतों के दबाव और पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण पैदा हुई अनिश्चितता के बीच, प्रधानमंत्री का जोशीला भाषण 'आत्मनिर्भरता' की अवधारणा के इर्द-गिर्द राष्ट्रीय आम सहमति बनाने का एक प्रयास था। प्रधानमंत्री ने यह सुझाव दिया कि भारतीय 'संयम' वाली जीवनशैली अपनाएं और विदेशी चीजों का त्याग करें। इसे वह एक राष्ट्रीय कर्तव्य मानते हैं। उन्होंने लोगों को सलाह दी कि वे एक साल तक सोना न खरीदें, विदेश यात्रा से बचें, 'घर से काम' और 'घर से पढ़ाई' को अपनाएं, बिना खाद वाली खेती की ओर रुख करें, सौर ऊर्जा का इस्तेमाल करें, गाड़ियों का उपयोग कम करें और मेट्रो का इस्तेमाल करें। साथ ही, 'डेस्टिनेशन वेडिंग' (बाहर जाकर शादी करने) का चलन छोड़कर भारतीय पर्यटन स्थलों पर घूमने जाएं। दरअसल, इसकी वजह वह झटका है, जो युद्ध के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था को लगा है। पिछले हफ्ते अप्रैल महीने में जीएसटी से हुई रिकॉर्ड 2.43 लाख करोड़ रुपये की कमाई छाई रही। इन आंकड़ों ने सरकार को दुविधा में डाल दिया। असल में जीएसटी के आंकड़ों से पता चला कि घरेलू बिक्री में सिर्फ 4.3 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, जबकि आयात से होने वाली जीएसटी कमाई में 25.8 फीसदी का जबर्दस्त उछाल आया। आयात की लागत में यह बढ़ोतरी असल में पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध का ही नतीजा है। होर्मुज जलडमरूमध्य एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की जीवन-रेखा है। बढ़ती मांग और आपूर्ति में रुकावट का असर कीमतों पर पड़ता है। भारत को सिर्फ कच्चे तेल के लिए जो ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है, उससे भारत के आयात बिल में 70 अरब डॉलर की बढ़ोतरी होने की आशंका है, क्योंकि भारत में कच्चे तेल के आयात की कीमत 100 से 130 डॉलर प्रति बैरल के बीच है। चूंकि दुनिया भर में गैस की आपूर्ति कम हो गई है, इसलिए भारत को उतनी ही कीमत चुकानी पड़ रही है, जितनी मांगी जा रही है। बढ़ती आयात लागत के चलते रुपया 95 रुपये प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर चुका है। जानकारों का मानना है कि यह 100 का आंकड़ा भी छू सकता है। असल में, चुनावी मौसम के कारण भारत सरकार ने उन पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें नहीं बढ़ाईं, जिन पर सब्सिडी का बोझ था। सब्सिडी की बढ़ती लागत (इस साल के लिए अनुमान तीन लाख करोड़ रुपये है) को ज्यादा समय तक जारी नहीं रखा जा सकता, क्योंकि इससे अर्थव्यवस्था के बुनियादी आधार (घाटा, कर्ज और ब्याज दरें) पूरी तरह से बिगड़ जाएंगे। मतदान खत्म होने के बाद से ही युद्ध कर, सुरक्षा कर, पूंजी के लेन-देन पर रोक और ऐसी ही कई दूसरी बातों को लेकर चर्चा जोरों पर है। रुपया में गिरावट के कारण विदेशी संस्थागत निवेशकों ने अपना पैसा निकालना शुरू कर दिया है—साल के पहले चार महीनों में उनकी कुल बिक्री दो लाख करोड़ रुपये रही, जो पूरे 2025 में हुई उनकी बिक्री से भी ज्यादा है। प्रधानमंत्री के बचत पर दिए गए उपदेश के बाद, सोमवार को शेयर बाजारों को जोरदार झटका लगा, और रुपये में भी भारी गिरावट आई। रुपये में गिरावट के कारण लोग सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख करते हैं, जिसके चलते रुपये में और गिरावट आती है। रुपये की मौजूदा स्थिति उसकी कमजोरी का कारण भी है और परिणाम भी। रुपये के सामने एक और खतरा यह है कि पिछले साल मिले 135 अरब डॉलर के रेमिटेंस (विदेश से आने वाले पैसे) की रफ्तार धीमी हो सकती है या यह कम हो सकता है। यदि खाड़ी देशों में रोजगार का सपना टूटने लगता है, तो इसका असर न केवल वहां से आने वाली रकम की मात्रा पर पड़ेगा, बल्कि रोजगार की तलाश करने वालों के लिए उपलब्ध विकल्पों पर भी पड़ेगा। इस संघर्ष ने हजारों विनिर्माण इकाइयों को उत्पादन के लिए जरूरी गैस से महरूम कर दिया है—कई इकाइयां अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं। एलपीजी की कमी के चलते मजदूर अपने घरों को लौट रहे हैं। रेस्टोरेंट बंद हो चुके हैं। ऊर्जा संकट ऐसे समय में आया है, जब रोजगार बाजार पहले से ही मुश्किल दौर से गुजर रहा है। एआई के आने के बाद आईटी सेवा क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों में अब नई भर्तियां धीमी हो गई हैं, जबकि छंटनी की रफ्तार तेज हो गई है। मोदी की अपील ने सोशल मीडिया पर समर्थन और नाराजगी, दोनों को जन्म दिया है। भारत में हर साल एक करोड़ से ज्यादा शादियां होती हैं। सोना धन के हस्तांतरण, शुरुआती पूंजी, विरासत, सुरक्षा और हेज निवेश का एक जरिया है। गोल्ड फाइनेंस कंपनियों ने 15 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज दिया है, जो इस पीली धातु के महत्व को रेखांकित करता है। जिन भारतीयों के पास सोना है, उन्हें अपनी होल्डिंग्स का कुछ हिस्सा इस्तेमाल करके आयात कम करने का विकल्प क्यों न दिया जाए लोग कार-पूलिंग के महत्व को समझते हैं, और जीवाश्म ईंधन से चलने वाले वाहनों का इस्तेमाल कम करना एक सही कदम है। लेकिन क्या इस उम्मीद को पूरा किया जा सकता है, जब राजनेता 10 या 20 गाड़ियों के काफिलों में गुजरते हैं क्या राइड सर्विस कंपनियां (जैसे उबर और ओला) पूलिंग को बढ़ावा देने के लिए कोई योजना बना सकती हैं मेट्रो से सफर करना तभी मुमकिन है, जब वह दो जगहों को आपस में जोड़ती हो—जरा मुंबई में पूर्वी और पश्चिमी मुंबई के बीच सफर करके देखिए! प्राकृतिक खेती का विचार अच्छा है, लेकिन भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए 30 करोड़ टन से अधिक खाद्यान्न की जरूरत है। भारत उर्वरकों के सभी घटक (ऊर्जा, फॉस्फेट और मशीनरी) आयात करता है। तो फिर पोषक तत्वों के लिए मोरक्को, कनाडा और ब्राजील के साथ अनुबंध क्यों न किया जाए एलपीजी की कमी ने पाइप वाली गैस कंपनियों को जगा दिया है। उम्मीद है कि यह संकट बिजली बोर्डों को भी जगाएगा, ताकि वे सौर ऊर्जा को अपनाने में मदद कर सकें। 'वर्क फ्रॉम होम' और 'वर्चुअल लर्निंग' अपनाने की अपील से पता चलता है कि यह एक बड़ा संकट है और इसके लिए अर्थव्यवस्था में बड़े बदलावों की जरूरत है। युद्ध के परिणामों से वैश्विक व्यवस्था को ढांचागत क्षति पहुंच रही है। अब चुनावी चक्र समाप्त हो चुका है। राजनीतिक वर्ग को गंभीरता से विचार करना चाहिए कि हम ऐसे दौर में अपना रास्ता कैसे तय करें, जहां अनिश्चितता ही एकमात्र स्थिर सत्य है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: May 16, 2026, 03:29 IST
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