विचार: नींव के पत्थरों का सच्चा सम्मान
भारत का सांस्कृतिक पुनर्जागरण तब तक अधूरा है, जब तक उन महापुरुषों और ऋषियों के तपोस्थलों को उनका उचित सम्मान नहीं मिलता, जिन्होंने इस देश की आत्मा को गढ़ा है। योगी सरकार की रणनीति अत्यंत स्पष्ट है। रामायण सर्किट और राम वन-गमन पथ के माध्यम से महर्षि वाल्मीकि से जुड़े प्रत्येक महत्वपूर्ण स्थल का कायाकल्प करना। इस पहल का सबसे प्रमुख केंद्र चित्रकूट के लालापुर स्थित वाल्मीकि आश्रम के रूप में उभर रहा है। यह वह तपोभूमि है, जहां महर्षि ने अपने ज्ञान और तपस्या से समाज को दिशा दी थी। पर्यटन विभाग द्वारा यहां स्थापित महर्षि वाल्मीकि की 12.5 फीट ऊंची भव्य कांस्य प्रतिमा और आश्रम का संपूर्ण विकास इस बात का प्रमाण है कि सरकार अपनी जड़ों की ओर पूरी निष्ठा से लौट रही है। इतना ही नहीं, एक भव्य पर्यटन सुविधा केंद्र का निर्माण अपने अंतिम चरण में है, जो भविष्य में दुनिया भर से आने वाले श्रद्धालुओं और शोधकर्ताओं के लिए एक बड़ा केंद्र बनेगा। इस विरासत को सहेजने के लिए सरकार ने कई और परियोजनाएं आगे बढ़ाई हैं। वाल्मीकि घाट, परिक्रमा पथ और आरती स्थल जैसी परियोजनाएं स्वीकृत हैं। अयोध्या और इटावा के वाल्मीकि स्थलों के लिए वित्तीय प्रावधान किया गया है, कानपुर के बिठूर आश्रम का संरक्षण और अयोध्या के नए हवाई अड्डे का नाम महर्षि वाल्मीकि के नाम पर रखा गया है। इसके अलावा सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में दस-दस स्मारक बन रहे हैं, जिनमें महर्षि वाल्मीकि, संत रविदास, संत कबीर, बाबा साहेब आंबेडकर और महात्मा ज्योतिबा फुले की मूर्तियां होंगी।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Oct 28, 2026, 16:45 IST
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