अमेरिकी चुनाव: डेमोक्रेट्स का दबदबा बढ़ा तो ट्रंप की बढ़ेंगी मुश्किलें? क्रिप्टो कंपनियों पर कस सकता है शिकंजा

अमेरिका की राजनीति में जल्द एक बड़ा भूचाल आ सकता है। अगर नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी कांग्रेस के किसी भी सदन में जीत हासिल कर लेती है, तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। इसका सबसे ज्यादा असर वॉल स्ट्रीट के बैंकों, क्रिप्टो कंपनियों और प्रेडिक्शन मार्केट्स पर पड़ सकता है। दरअसल, ट्रंप सरकार हमेशा से क्रिप्टो और प्रेडिक्शन मार्केट्स जैसे नए सेक्टर्स को बढ़ावा देती आई है। सरकार का मानना है कि इससे देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और नौकरियां बढ़ेंगी। लेकिन डेमोक्रेट्स इन मामलों को लेकर बिल्कुल अलग सोच रखते हैं। डेमोक्रेट्स को मिलेंगे बड़े अधिकार: राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बार के चुनावों में डेमोक्रेट्स प्रतिनिधि सभा में जीत हासिल कर सकते हैं और सीनेट की रेस में भी आगे चल रहे हैं। अगर वे किसी भी एक सदन में बहुमत पा लेते हैं, तो उनके पास भारी ताकत आ जाएगी। इससे वे किसी भी बड़े सरकारी अधिकारी या किसी बड़ी कंपनी के सीईओ को सीधे समन भेजकर पूछताछ के लिए बुला सकेंगे। बड़े बैंकों के सीईओ निशाने पर क्रिप्टो कंपनियों के अधिकारियों के बीच इस बात को लेकर सबसे ज्यादा डर है कि अगर डेमोक्रेट्स जीते, तो प्रतिनिधि शॉन काउस्टेन इस क्षेत्र में कड़े कदम उठा सकते हैं। काउस्टेन पहले भी क्रिप्टो नियमों को सख्त बनाने की वकालत करते रहे हैं और मनी लॉन्ड्रिंग रोकने वाले बिल ला चुके हैं। इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि वे क्रिप्टो सेक्टर के लिए मुश्किलें पैदा कर सकते हैं, हालांकि व्हाइट हाउस ने इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि ट्रंप सरकार सिर्फ अमेरिकियों की भलाई और देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने पर ध्यान दे रही है। एआई, बैंक और महंगाई भी निशाने पर सिर्फ क्रिप्टो ही नहीं, बल्कि एआई और बड़े-बड़े बैंकों के सीईओ भी डेमोक्रेट्स के रडार पर हैं। सीनेट बैंकिंग कमेटी की संभावित प्रमुख एलिजाबेथ वॉरेन एआई कंपनियों की नीतियों पर पहले ही सवाल उठा चुकी हैं। उनका आरोप है कि इन बड़ी टेक कंपनियों को सरकार के भीतर बहुत ज्यादा छूट और पहुंच मिल रही है। जिस पार्टी का राष्ट्रपति, उसकी राह क्यों नहीं होती है आसान अमेरिका में राष्ट्रपति के कार्यकाल के ठीक मध्य में होने वाले मध्यावधि चुनाव में निचले सदन प्रतिनिधि सभा के सभी 435 और 100 सदस्यों वाली सीनेट के एक-तिहाई सदस्यों का चुनाव होगा। जाहिर है, इससे अमेरिकी कांग्रेस में पूरा समीकरण बदल जाएगा। इसे राष्ट्रपति और उनकी पार्टी के पिछले दो साल के कामकाज का सीधा मूल्यांकन या जनमत संग्रह माना जाता है। मध्यावधि चुनाव उस पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित होता है, जिसका राष्ट्रपति सत्तासीन होता है। कई दशकों का इतिहास बताता है कि इन चुनावों में अक्सर राष्ट्रपति की पार्टी को हाउस या सीनेट में अपनी सीटें गंवानी पड़ती हैं, क्योंकि जनता सरकार की कमियों पर अपना असंतोष व्यक्त करती है। मध्यावधि चुनाव नतीजों को अगले राष्ट्रपति चुनाव का सेमीफाइनल माना जाता है। भारत और वैश्विक मंच पर क्या असर संभव है अमेरिका की घरेलू राजनीति कभी उसकी सीमाओं तक सीमित नहीं रहती क्योंकि दुनिया के सबसे ताकतवर देश की नीतियां प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सबको प्रभावित करती हैं। इसलिए नतीजों का भारत सहित पूरी दुनिया पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। सीनेट के पास विदेशी संधियों को मंजूरी देने और रक्षा बजट को पास करने का अधिकार होता है। सत्ता परिवर्तन से अमेरिका की सैन्य सहायता और वैश्विक गठबंधनों को लेकर रुख बदल सकता है। अमेरिका में भारत के साथ मजबूत रिश्तों को डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों प्रमुख पार्टियों का समर्थन हासिल है। हालांकि, एच-1बी वीजा नीति, आव्रजन नियम, और टैरिफ को लेकर संसद के नए समीकरण भारत के आईटी सेक्टर और निर्यात को प्रभावित कर सकते हैं।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Oct 15, 2026, 04:42 IST
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