हिसार में युवा बदले, ज़िंदगी बदली; नशे से निकलकर अब दूसरों का सहारा बने

लंबे समय तक नशे की दलदल में रहे कुछ युवा अब इस दलदल से बाहर आ चुके हैं। यह युवा अब रोल मॉडल की भूमिका निभाते हुए दूसरे युवाओं को इस दलदल से निकालने का प्रयास कर रहे हैं। अंकुश फाउंडेशन के साथ जुड़े यह युवा लोगों को नशा छुड़वाने के लिए प्रेरित करते हैं। अपना उदाहरण देकर युवाओं को समझाते हैं। उनके साथ बैठ कर उनके दुख तकलीफ में उनके सहयोगी बनते हैं। अमर उजाला ने इन युवाओं से उनकी नशे की लत में पड़ने से लेकर नशे की जहरीली दुनिया से बाहर आने तक की कहानी सुनी। जिसके सच्ची कहानी कुछ अंश आप भी पढि़ए। केस एक मैंने सिगरेट से शुरुआत की थी। दोस्तों ने नशे की आदत डाल दी। जब में नशे की आदत में थ तो कई बार तलब होती थी। उस समय रिजल्ट का पता नहीं था। मैंने फ्लूड का नशा भी शुरु कर दिया था। करीब 5 किलो फ्लूड की थैली मेरे पापा ने मेरे से छीन कर एसपी को सौंप दी थी।उसके बाद हिसार में फ्लूड पर शिकंजा कसा गया था। मुझे नहीं लगता था कि मैं कभी नशा छोड़ पाऊंगा। कई बार भगवान से प्रार्थना करता था। पुनर्वास केंद्र में मेरे साथ किसी तरह का बुरा बर्ताव नहीं हुआ। तीन साल पहले नशा छोड़ दिया। अब सेक्टर 4 में अपनी दुकान चलाता हूं।अब जो नशा आ रहा है केमिकल वाला आ रहा है। जो ज्यादा नुकसान दे रहा है। अब स्मैक भी दोबारा से बिक रही है। जिसको खरीदने व बेचने वाले लाल परी के नाम से जानते हैं। केस 2 2018 में एक रोहतक के एक पुनवार्स केंद्र गया था। वहां मुझे उल्टा लटकाया, मारा -पीटा गया। स्कूल के समय शराब से मैंने नशे की शुरुआत की। स्कूल खत्म होते होते मैं स्मैक के नशे में पड़ गया। नशे के कारोबार में शासन प्रशासन सब मिले हुए हैं। मैं एक बार स्मैक के साथ पकड़ा गया था। मेरे पिता 35 हजार रूपये देकर छुड़वा लाए। मेरे साथ पकड़े गए दूसरे साथी पर आज भी केस दर्ज है। अब बहुत मिलावट वाला नशा आ रहा है। जिस कारण स्मैक, हेरोईन वाले की एक से तीन साल में मौत हो जाती है। जब मेरी फैमिली आती थी तो हमें पीटा जाता था। अच्छे पुनवार्स केंद्र को अपनाना चाहिए। मैंने चार साल पहले नशा छोड़ दिया। अब मैं अंकुश फाउंडेशन से जुड़ कर दूसरे लोगों को नशा छुड़वाने के लिए प्रेरित करता हूं। केस 3 मेरे दादा शराब पीते थे, मैं लोगों को तंबाकू जर्दा का नशा करता देखता था। तब मुझे लगता था कि मैं भी करुं।मैं दस साल की आयु में ही नशे में ही पड़ गया था। मुझे कड़वा स्वाद पंसद नशा नहीं था। जिस कारण मैंने सुल्फा से नशे की शुरुआत की। फिर स्मैक का नशा भी किया। कुछ नया करने के लिए मैंने छिपकली की पूंछ का नशा भी किया। छिपकली की पूछ 300 रुपये मिलता था। सांप का जहर निकाल कर उसे पीने की कोशिश भी की। एक समय ऐसा था कि मुझे अपने मां-बाप की हत्या करने का मन करता था। परिवार के लोगों ने एक नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती कराया वहां मेरे साथ अच्छा व्यवहार नहीं हुआ। जिसके चलते मैं नशा नहीं छोड़ पाया। तीसरी बार में जब मैं हिसार आया तो मुझे अच्छा माहौल मिला। तब मैं नशा छोड़ पाया। पांच साल पहले मैंने नशा छोड़ दिया अब मैं खेती बाड़ी करता हूं। नशे से साइड इफेक्ट आज भी होता है। केस चार मैं मल्टी ड्रग यूजर रहा हूं। मैंने पहली बार में ही अच्छे लोग मिले तो मैंने पहले प्रयास में ही नशा छोड़ दिया। 11 साल पहले नशा छोड़ दिया। चार पहले मैंने स्मोकिंग भी छोड़ दी। अब मैं अपनी दुकान चला कर परिवार के साथ रहता हूं। अब मेरा परिवार खुश हूं। नशा बिकने के बारे में पुलिस को जानकारी होती है। सरकार ने नशा मुक्ति के काम पर कई तरह की पाबंदी लगा दी है। एनजीओ के नशा मुक्ति केंद्रों के लिए कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए गए हैं। सरकार को अपने स्तर पर नशा मुक्ति के बेहतरीन केंद्र खोलना चाहिए। नशा छुड़वाने के लिए दवाइयों से ज्यादा अच्छे माहौल, काउंसिलिंग की जरूरत होती है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Nov 20, 2025, 11:37 IST
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