रिकॉर्ड मतदान के मायने: 92 फीसदी से ज्यादा वोटिंग का संदेश, संतोष या सत्ता विरोध

भारतीय चुनाव में जो कभी नहीं हुआ, वह 2026 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हो गया। अभी तक 92.86 प्रतिशत मतदान रिकॉर्ड हुआ है। तमिलनाडु में भी लगभग 85 फीसदी मतदान एक रिकॉर्ड है। अंतिम आंकड़ा आने के बाद इसमें और वृद्धि होगी। बंगाल में 2011 में 84.5, 2016 में 82.56 और 2021 में 81.56 फीसदी मतदान हुआ था। मतदान का दूसरा चरण अभी बाकी है, इसलिए संपूर्ण मूल्यांकन उसके बाद ही होगा। पर चुनाव के दौरान बने माहौल का संकेत यही है कि मतदान की रिकॉर्ड प्रवृत्ति में ज्यादा अंतर नहीं आने वाला। वर्ष 2010 से पहले मतदान प्रतिशत में सामान्य वृद्धि को सत्तारूढ़ पार्टी की पराजय के रूप में देखा जाता था और अधिकतर मामलों में ऐसा ही हुआ। बाद में मतदान बढ़ने के बावजूद सरकारें वापस सत्ता में आती रहीं। इसलिए मतदान प्रतिशत किसी सरकार के जाने या नई सरकार के आने का निश्चित संकेत नहीं माना जा सकता। चुनाव आयोग द्वारा विशेष मतदाता पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया के कारण अब वास्तविक मतदाताओं के नाम ही बचे हैं। इसलिए हर राज्य में मतदान प्रतिशत थोड़ा संतोषजनक ही होगा। बंगाल में कुल 90 लाख 83 हजार 345 मतदाताओं का नाम सूची से हटा। कई लाख मतदाताओं ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई है और न्यायिक प्राधिकरणों को फैसला करना है। किंतु 7.66 करोड़ की जगह अब मतदाताओं की संख्या 6.7 करोड़ ही रह गई। इसलिए प्रतिशत ज्यादा होते हुए भी कुल मतों की संख्या इतनी नहीं बढ़ी है। ममता समर्थक और भाजपा समर्थक, दोनों खेमों में मतदाताओं को ज्यादा संख्या में मतदान केंद्रों तक पहुंचाने की प्रबल भावना है। भाजपा और उसके विरोधियों की दो ध्रुवीय राजनीति में पक्ष और विपक्ष, दोनों तरह की लहर देखी गई है। बंगाल में 1967 के बाद से ही मतदाताओं की सुरक्षा हमेशा बड़ा मुद्दा रहा है। कांग्रेस, फिर वाम दल और तृणमूल कांग्रेस ने भी चुनावी रैगिंग या धांधली की प्रवृत्ति को कायम रखा। इस बार मतदाताओं का बड़ी संख्या में निकलने का एक प्रमुख कारण मतदान और उसके बाद के लिए दिखता सुरक्षा आश्वासन था। पहले चरण में केंद्रीय बलों की 2407 कंपनी, 2193 क्विक रिस्पांस टीम व 40,000 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी। जहां कुछ समस्या हो रही थी, केंद्रीय बल तुरंत पहुंचते थे। इसके बावजूद दक्षिण दिनाजपुर के एक भाजपा उम्मीदवार की पिटाई का वीडियो देखने से अनुमान लग जाता है कि माहौल कितना आतंकमय था। हालांकि सुरक्षा व्यवस्था के कारण हिंसा में भी भारी कमी आई। लंबे समय बाद मतदान हत्याविहीन, न्यूनतम हिंसा और निर्भयता के वातावरण में संपन्न हुआ है। चुनाव अभियान के बीच प्रदेश का दौरा करने वालों को 2026 में माहौल में बदलाव दिख रहा था। मतदाता धीरे-धीरे खुलकर अपना विचार प्रकट करने लगे थे। ममता और उनके समर्थकों की आक्रामकता का जवाब भाजपा ने भी प्रति आक्रामकता से दिया। गृहमंत्री अमित शाह तक के भाषणों में आक्रामकता थी, ताकि उनके समर्थक निर्भय होकर मतदान के लिए निकलें। ममता ने भी अपने समर्थकों से कहा कि किसी कार्यकर्ता पर कार्रवाई होगी, तो सरकार साथ खड़ी तो रहेगी ही, हम उन्हें सरकारी नौकरी दे देंगे। यदि मुस्लिम मतदाता भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए मतदान करने निकले होंगे, तो उनकी प्रतिक्रिया में गैर-मुस्लिम समुदाय भी निकले हैं, जो टीवी कैमरों पर दिख रहे थे। दक्षिण दिनाजपुर, मुर्शिदाबाद, मालदा, आदि जिलों में दोनों पक्षों में करो या मरो का भाव पैदा हो चुका था। पर जहां एक पक्ष कम रहा, वहां मतदान प्रतिशत कम हुआ और दार्जिलिंग, कालिमपोंग आदि इसके उदाहरण हैं। बंगाल को समझने वाले मानेंगे कि लगातार तीन कार्यकाल के बाद ममता बनर्जी के विरुद्ध सत्ता विरोधी रुझान भी है तथा बदलाव के लिए निकलने वाले मतदाताओं की भी भारी संख्या है। ममता और तृणमूल के राज में सत्ता से जुड़े निहित स्वार्थी तत्व तथा विरोधियों के विरुद्ध सत्ता व प्रशासन के भयानक दुरुपयोग, भ्रष्टाचार, महिलाओं के विरुद्ध जघन्य अपराध घटनाएं सबके सामने हैं। दंगों के दौरान प्रशासन की भूमिका, कभी संपन्न, उद्योगों तथा कारोबार के मामले में देश का अगुआ राज्य का पीछे होना और संपूर्ण आर्थिक स्थिति पर इसके नकारात्मक असर के कारण भी असंतोष दिखाई दे रहे हैं। भाजपा ने इन सबको मुद्दा बनाया। ऐसे में अगर ममता के खिलाफ मतदाताओं का गुस्सा प्रकट हुआ हो, तो हैरानी नहीं। इस तरह रिकॉर्ड मतदान के पीछे इन सभी कारकों की सामूहिक भूमिका रही।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Apr 27, 2026, 04:35 IST
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