SEBI: एसटीटी बढ़ने के बाद भी डेरिवेटिव पर कोई नया नियम नहीं, सेबी चेयरमैन ने अटकलों को किया खारिज

केंद्रीय बजट 2026 में डेरिवेटिव लेनदेन पर प्रतिभूति लेनदेन कर (एसटीटी) बढ़ाने की घोषणा के कुछ ही दिनों बाद, बाजार में आगे सख्ती की अटकलें तेज हो गई थीं। इन अटकलों पर विराम लगाते हुए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने स्पष्ट किया कि नियामक फिलहाल डेरिवेटिव बाजार में किसी अतिरिक्त हस्तक्षेप पर विचार नहीं कर रहा है। हालिया प्रश्नोत्तर सत्र में सेबी प्रमुख ने कहा कि नियामक डेरिवेटिव बाजारों का विश्लेषण पूरी तरह डेटा-संचालित और व्यवस्थित तरीके से करता है। उन्होंने जोर दिया कि हम किसी नए उपाय पर विचार नहीं कर रहे हैं। जो नियामक ढांचा मौजूद है, वही जारी रहेगा। इसके साथ ही पांडे ने साप्ताहिक एक्सपायरी अनुबंधों को समाप्त करने की अफवाहों को भी खारिज कर दिया और कहा कि अभी तक ऐसे किसी बदलाव पर चर्चा नहीं हुई है। भारत के कम उपयोग हो रहे बॉन्ड बाजार पर जोर सेबी द्वारा आयोजित 'पैन-इंडिया आउटरीच प्रोग्राम फॉर कॉरपोरेट बॉन्ड्स' के उद्घाटन सत्र में पांडे ने भारत के बॉन्ड बाजार की भूमिका पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की जरूरतों को पूरा करने के लिए केवल बैंक ऋण पर्याप्त नहीं है, पूंजी बाजारों को इस वृद्धि का नेतृत्व करना होगा। उन्होंने मजबूत बैंकिंग व्यवस्था के साथ-साथ स्वच्छ, तरल और भरोसेमंद पूंजी बाजार की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि बुनियादी ढांचे, हरित परिवर्तन, विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों के लिए दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराया जा सके। सेबी प्रमुख के मुताबिक, भारत पिछले तीन वर्षों में औसतन 7.8% तिमाही जीडीपी वृद्धि के साथ दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, जबकि वित्त वर्ष 2026 के लिए वृद्धि का अनुमान 7.4% है। कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार के आंकड़े और चुनौतियां कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार की स्थिति बताते हुए पांडे ने कहा कि वित्त वर्ष 2025 में जारीकर्ताओं ने कर्ज निर्गम के जरिए करीब 10 ट्रिलियन रुपये जुटाए। अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच यह आंकड़ा लगभग 6.8 ट्रिलियन रुपये रहा। पिछले एक दशक में बकाया कॉरपोरेट बॉन्ड्स 12% की चक्रवृद्धि वार्षिक दर (CAGR) से बढ़कर वित्त वर्ष 2015 के 17.5 ट्रिलियन रुपये से दिसंबर 2025 तक 58 ट्रिलियन रुपये पर पहुंच गए हैं। यह उद्योग और सेवा क्षेत्रों को दिए गए बैंक ऋण का लगभग 60% है। हालांकि, उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत में कॉरपोरेट बॉन्ड्स का बकाया जीडीपी का केवल 16% है, जो दक्षिण कोरिया (79%), मलेशिया (54%) और चीन (38%) से काफी कम है। इसके अलावा, इक्विटी में सूचीबद्ध 5,600 से अधिक कंपनियों के बावजूद केवल 770 इकाइयों ने ही कर्ज बाजार के जरिये पूंजी जुटाई है, जिनमें से महज 272 ने एक से अधिक बार बॉन्ड जारी किए हैं। निवेशकों में जागरूकता की कमी पांडे ने निवेशकों में जागरूकता की कमी को भी बड़ी चुनौती बताया। सेबी के निवेशक सर्वे का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि कॉरपोरेट बॉन्ड को निवेश उत्पाद के रूप में केवल 10% लोगों की जानकारी है, जो जमा, बीमा, लघु बचत योजनाओं और यहां तक कि क्रिप्टोकरेंसी (15%) से भी कम है। उन्होंने विकसित कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार के लाभ गिनाते हुए कहा कि यह बैंक ऋण का विकल्प प्रदान करता है, जोखिमों का विविधीकरण करता है और कंपनियों के लिए पूंजी की लागत कम करने में मदद कर सकता है। म्यूनिसिपल बॉन्ड्स पर संभावनाएं म्यूनिसिपल बॉन्ड्स को लेकर सेबी प्रमुख ने कहा कि इस क्षेत्र में भी जागरूकता की कमी है। फिलहाल नगरपालिकाओं द्वारा जारी बॉन्ड्स की संख्या बेहद सीमित है अब तक केवल 12 निर्गम हुए हैं। हालांकि, बजट घोषणाओं के मुताबिक सरकार नगरपालिकाओं को ऐसे बॉन्ड जारी करने में समर्थन देगी। पांडे ने कहा कि भले ही यह बाजार अभी शुरुआती और लगभग नगण्य स्तर पर है, लेकिन इसमें भविष्य में बड़ी संभावनाएं हैं और इसके लिए नियामक ढांचा तेजी से विकसित हो रहा है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Feb 04, 2026, 13:39 IST
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