नाबालिग की कस्टडी विवाद में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका विकल्प नहीं : हाईकोर्ट

कहा-जब बच्चे की कस्टडी अवैध या गैर कानूनी हो तो ही यह हो सकती है विकल्प-विशेष परिस्थितियों में अदालत इस शर्त को कर सकती है समाप्तअमर उजाला ब्यूरोचंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि नाबालिग बच्चों की कस्टडी संबंधी विवादों में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को अभिभावकत्व (गार्डियन्स एंड वार्ड्स एक्ट) कानूनों के तहत चलने वाली विधिक कार्यवाही का विकल्प नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट तभी हस्तक्षेप कर सकता है जब बच्चे की हिरासत स्पष्ट रूप से अवैध या गैरकानूनी हो।जस्टिस सुमित गोयल ने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर हस्तक्षेप करने का अधिकार तभी बनता है जब यह सिद्ध हो जाए कि बच्चे की वर्तमान कस्टडी अवैध है। हालांकि, विशेष परिस्थितियों में और बच्चे के सर्वोत्तम हित में अदालत इस शर्त को शिथिल कर सकती है। सामान्य सिद्धांत के अनुसार, यदि बच्चा अपने किसी प्राकृतिक अभिभावक (माता या पिता) के पास है, तो इसे अवैध हिरासत नहीं माना जा सकता। जब तक कि किसी सक्षम अदालत का आदेश इसके विपरीत न हो। हाईकोर्ट ने कहा कि नाबालिग की कस्टडी से जुड़े मामलों में कोर्ट का मुख्य उद्देश्य बच्चे के कल्याण को देखना है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई नाबालिग उस व्यक्ति के पास है जिसे कानूनन अभिभावकत्व का अधिकार नहीं है, तो ऐसी स्थिति को अवैध हिरासत माना जाएगा और बंदी प्रत्यक्षीकरण का सहारा लिया जा सकेगा। वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता मां ने अपने बच्चे की कस्टडी के लिए याचिका दायर की थी लेकिन अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता पहले ही गार्डियन्स एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 के तहत कस्टडी के लिए अर्जी दाखिल कर चुकी है। ऐसे में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के प्रयोग का कोई औचित्य नहीं बनता।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Aug 29, 2025, 18:32 IST
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