देश में अब वाम दलों की कोई सरकार नहीं: आखिरी किला केरल भी ढहा, 1977 के बाद पहली बार वामपंथी राजनीति का अवसान
केरलम में विजयन सरकार के पतन के साथ ही भारत वामदल सरकार मुक्त हो गया है। 1977 के बाद से यह पहला मौका है जब देश के किसी राज्य में वामपंथी दलों की सरकार नहीं है। एक समय था जब केरलम के अलावा पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में न सिर्फ वामपंथी दलों की सरकारें थी, बल्कि उनका दबदबा भी था। वामपंथी राजनीति का अवसान सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में हो रहा है। रूस, क्यूबा और उत्तर कोरिया जैसे गिने-चुने देशों में ही वामपंथी सरकारें रह गई हैं। कहने को तो चीन में भी कम्युनिस्ट सरकार है, लेकिन वह सिर्फ नाम की कम्युनिस्ट है, काम में पूंजीवादी सरकार है। केरलम: 1957 में भाकपा ने पहली सरकार बनाई केरलम में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने 1957 में अपनी पहली सरकार बनाई थी। इलमकुलम मनक्कल शंकरन यानी ईएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व में बनी इस सरकार को मामूली बहुमत ही मिला था, लेकिन यह दुनिया में कहीं भी लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई पहली वाम सरकार थी। केरलम में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेतृत्व वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) और कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) के बीच सत्ता की अदला-बदली होती रही है। लेकिन पिछले 10 वर्षों से राज्य में एलडीएफ की सरकार थी। उसे तीसरी बार भी सत्ता में लौटने की उम्मीद थी, लेकिन यूडीएफ ने उसके मंसूबों पर पानी फेरते हुए सत्ता पर कब्जा जमा लिया है। केरलम वामपंथी दलों का आखिरी किला था, जहां उनकी सरकार थी। इससे पहले, 2011 में पश्चिम बंगाल वामदलों के हाथ से निकल गया, जब ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस ने उनके 34 साल की सत्ता को उखाड़ फेंका था। त्रिपुरा में 2018 के विधानसभा चुनाव में वामदलों को हार का सामना करना पड़ा और भाजपा व आईपीएफटी गठबंधन की जीत के साथ ही राज्य से 25 साल के वामदलों के शासन का अंत हुआ। प. बंगाल: 1977-2011 तक वामदलों की अटूट सरकार देश की सियासत में अहम स्थान रखने वाले पश्चिम बंगाल में 1977 में पहली बार वामपंथी दल की सरकार सत्ता में आई थी। ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने थे, उसके बाद से 2011 तक राज्य में वामदलों की सरकार रही। मुख्यमंत्री भले ही बसु के स्थान पर बुद्धदेव भट्टाचार्य बन गए थे। दोनों के नेतृत्व में किसी राज्य में वाम दल का सबसे लंबा अटूट शासन रहा। हालांकि, बंगाल में साम्यवाद का लंबा इतिहास रहा है। इसकी शुरुआत एमएन रॉय के समय से हुई, जिन्होंने 1925 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की थी। स्वतंत्रता के बाद, पार्टी ने बंगाल में 1977 की अपनी जीत का श्रेय आंशिक रूप से 1972 में कांग्रेस की ओर से कथित तौर पर चुनाव में धांधली और उसके शासनकाल में आपातकाल (1975-77) की ज्यादतियों को दिया। भाकपा विभाजन, माकपा का जन्म 1964 में भाकपा का विभाजन हुआ और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के रूप में नई पार्टी का जन्म हुआ। तीन दशकों से अधिक सत्ता में रहने के बाद, वामपंथी दल ने 2011 में बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस से सत्ता खो दी। 90 के दशक में औद्योगीकरण की नीति और जबरन भूमि अधिग्रहण ने उनके पारंपरिक आधार को उनसे दूर कर दिया और एक विकल्प के उदय का अवसर प्रदान किया। त्रिपुरा : 1977 में पहली वाम सरकार त्रिपुरा में भी पहली कम्युनिस्ट सरकार 1977 में सत्ता में आई। उसके बाद पार्टी ने कई चुनावी जीत हासिल कीं। 1998 में माणिक सरकार के नेतृत्व में बनी वाम सरकार सबसे लंबे समय 2018 तक सत्ता में रही। संघ ने महिलाओं, युवाओं और आदिवासियों के बीच काम किया और इसके परिणाम स्वरूप राज्य में 2018 में भाजपा की सरकार बनी। माणिक सरकार के पतन का कारण वेतन आयोग भी बना। जब सातवां वेतन आयोग लागू था, तब त्रिपुरा में चौथे वेतन आयोग से भुगतान हो रहा था, जिससे युवाओं में आक्रोश था। अन्य वीडियो-
- Source: www.amarujala.com
- Published: May 05, 2026, 05:24 IST
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