Report: शहरों में 40% महिलाएं अब भी खुद को महसूस करती हैं असुरक्षित, दिल्ली-कोलकाता जैसे शहर सबसे कम महफूज
शहरी क्षेत्रों में रहने वाली 40 फीसदी महिलाएं खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं। उनमें रात के वक्त सुरक्षा की भावना सबसे कम हो जाती है। खासकर सार्वजनिक परिवहन और मनोरंजन स्थलों पर। सात फीसदी महिलाओं को पिछले वर्ष सार्वजनिक स्थलों पर उत्पीड़न झेलना पड़ा। राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष विजया रहाटकर द्वारा बृहस्पतिवार को जारी राष्ट्रीय वार्षिक रिपोर्ट और महिला सुरक्षा सूचकांक (नारी) में यह खुलासा है। इसके अनुसार, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के अलावा कोलकाता, जयपुर, पटना, श्रीनगर, रांची, फरीदाबाद जैसे शहर आधी आबादी के लिए सबसे कम महफूज हैं। आश्चर्यजनक यह है कि असुरक्षित शहरों में ज्यादातर राज्यों की राजधानियां हैं। इसकी वजह है, इन शहरों में पितृसत्तात्मक सोच, कमजोर संस्थागत जवाबदेही और महिलाओं के लिहाज से खराब बुनियादी ढांचा। मजबूत लैंगिक समानता, नागरिक भागीदारी, पुलिस व्यवस्था और महिला अनुकूल बुनियादी ढांचे के चलते मुंबई, कोहिमा, विशाखापत्तनम, भुवनेश्वर, आइजोल, गंगटोक व ईटानगर सबसे सुरक्षित शहर बनकर उभरे हैं। यह सर्वे 31 शहरों की 12,770 महिलाओं पर किया गया। रिपोर्ट में कहा है, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े महिला उत्पीड़न की असल तस्वीर पेश नहीं कर सकते, जब तक इन्हेंे नारी जैसे धारणा-आधारित सर्वेक्षणों के साथ एकीकृत नहीं किया जाता। रहाटकर ने कहा, हम अक्सर व्यवस्था को दोष देते हैं, पर समाज की भूमिका भी उतनी ही अहम है। ये भी पढ़ें:बारिश का कहर जारी:जम्मू-कश्मीर, पंजाब, असम से ओडिशा-तेलंगाना तक पानी-पानी इस हफ्ते भी राहत के आसार नहीं महिलाएं अपने मोहल्ले में भी सुरक्षित नहीं रिपोर्ट के अनुसार, 10 में से 6 महिलाएं ही सुरक्षित महसूस करती हैं। महिलाओं ने माना, शैक्षणिक संस्थान दिन में 86 फीसदी सुरक्षित लगते हैं, पर रात में या परिसर के बाहर सुरक्षा का भरोसा कम हो जाता है। सात फीसदी महिलाओं ने कहा, 2024 में सार्वजनिक जगहों पर उन्हें उत्पीड़न झेलना पड़ा। 24 साल से कम उम्र की महिलाओं में यह आंकड़ा दोगुना होकर 14 फीसदी तक पहुंच गया। महिलाओं को सर्वाधिक उत्पीड़न का सामना मोहल्लों (38 फीसदी) और सार्वजनिक परिवहन (29 फीसदी) में करना पड़ा। हालांकि, महज तीन में से एक महिला ने ही शिकायत दर्ज कराई। 69 फीसदी ने कहा, महिला सुरक्षा के लिए उठाए गए मौजूदा कदम ठीक हैं। 30% ने बड़ी खामियां बताईं। 65% ने माना कि 2023–24 में सुरक्षा में सुधार हुआ, लेकिन संतोषजनक नहीं। 75 फीसदी महिलाओं को सही कार्रवाई का भरोसा ही नहीं 91 फीसदी महिलाएं खुद को दफ्तर में सुरक्षित मानती हैं। हालांकि आधी महिलाओं को यह पता ही नहीं था कि उनके दफ्तर में कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 नीति है या नहीं। जहां यह नीति थी, महिलाओं ने उसे असरदार बताया। हालांकि, उन्हें शिकायत पर कार्रवाई को लेकर संस्थाओं पर भरोसा कम है। चार में से तीन यानी 75 फीसदी को शिकायतों पर उचित कार्रवाई का भरोसा नहीं है। ये भी पढ़ें:सीट का समीकरण:कभी कांग्रेस का गढ़ रही हरसिद्धि सीट पर अभी है भाजपा का कब्जा, ऐसा है इसका चुनावी इतिहास आयोग की अध्यक्ष बोलीं-महिला सुरक्षा सिर्फ कानून-व्यवस्था नहीं महिला आयोग की अध्यक्ष रहाटकर ने कहा कि महिला सुरक्षा महज कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है। यह महिलाओं के जीवन के हर पहलू से जुड़ा है। फिर चाहे वह उनकी शिक्षा, सेहत, काम के अवसर और आवागमन की स्वतंत्रता ही क्यों न हो। उन्होंने कहा, महिलाओं को सिर्फ सड़क के अपराधों से नहीं, बल्कि साइबर क्राइम, आर्थिक भेदभाव और मानसिक उत्पीड़न से भी बचाना है। रहाटकर ने कहा, महिला पुलिसकर्मियों-ड्राइवरों की बढ़ती मौजूदगी से भरोसा बढ़ा है। कई केंद्रशासित प्रदेशों में अब 33 फीसदी पुलिसकर्मी महिलाएं हैं। उन्होंने महिला हेल्पलाइन, स्मार्ट शहरों में सीसीटीवी कवरेज व रेलवे स्टेशनों व बस डिपो पर बेहतर सुरक्षा नेटवर्क जैसी पहलों की सराहना की।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Aug 29, 2025, 05:49 IST
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