अंतत: सनातन के आदर्श क्या हैं: जिसके अभाव में इंद्र से रावण तक की गई सत्ता, हमारी संस्कृति में आचरण सर्वोच्च

हमारी सनातन सभ्यता-संस्कृति में आचरण को प्रथम स्थान दिया गया है। आचरण के अभाव में बड़े नाम वाले व्यक्ति या संस्थाएं ही नहीं, देवराज इंद्र से लेकर रावण तक की भी सत्ता चली गई। सनातन-सनातन के नाम का नारा लगाने से हिंदू धर्म को कितना लाभ हुआ है, इसका सर्वमान्य निष्कर्ष अभी नहीं निकला है। विशेष रूप से, जब हम सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों को ही न जानते हों और सनातन-सनातन के नारे लगते रहें, पर हमारा व्यक्ति, व्यवस्था व सत्ता के आचरण से कोई लेना-देना नहीं हो, तो ये थोथी नारेबाजी ही होगी। इसका सनातन धर्म से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होगा। सनातन धर्म ही हिंदू धर्म है। इसके मूल सिद्धांत गहन और सार्वभौमिक हैं। ये सिद्धांत वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, मनुस्मृति और अन्य शास्त्रों से निकले हैं। सनातन धर्म कोई एक किताब या संस्थापक पर आधारित नहीं है, बल्कि यह शाश्वत सत्य की खोज के लिए समर्पित वैयक्तिक और सामाजिक उत्कर्ष को प्राप्त करने के लिए जीवन जीने की व्यवस्था है। यह जाति, वर्ण, भौगोलिक परिस्थिति और देशकाल के आधार पर किसी से भेद नहीं करता। सनातन धर्म के सबसे व्यापक रूप से स्वीकृत मूल पहला सिद्धांत है: ब्रह्म सत्यं यानी केवल एक परम सत्य है – ब्रह्म या परमात्मा, जो निराकार रूप में सर्वव्यापी चेतना है और जीवात्मा से अभिन्न है। यह अद्वैत दर्शन है और द्वैतवाद में परमात्मा साकार रूप में है और वह जीव से एक होकर भी भिन्न है। जैसे नमी वायु में सर्वत्र व्याप्त है, लेकिन दिखाई नहीं देती। यह उसका निराकार स्वरूप है। जब तापक्रम बहुत गिर जाता है, तो यही नमी सघन होकर ओस, वर्षा, धुंध या बर्फ बनकर दिखने लगती है। यह उसका साकार रूप है। भक्त की भावना जब इतनी प्रबल हो जाती है कि उसे अपने आराध्य को देखे बिना चैन नहीं पड़ता, तब निराकार ब्रह्म साकार रूप धारण करके अपने भक्त को दर्शन देते हैं। सनातन धर्म का दूसरा सिद्धांत है: आत्मा अजर-अमर अविनाशी, शाश्वत और जन्म-मृत्यु से परे है। शरीर नश्वर है, आत्मा नहीं। “नैनं छिन्दंति शस्त्राणि” (गीता 2.20) तीसरा कर्म का सिद्धांत है: जैसा कर्म करोगे, वैसा फल मिलेगा (कारण-कार्य का नियम)। अच्छे-बुरे कर्मों का लेखा-जोखा जीवन-दर-जीवन चलता है। चौथा है पुनर्जन्म का सिद्धांत यानी संसार चक्र। आत्मा कर्मों के अनुसार बार-बार नए शरीरों में आती रहती है। जन्म-मरण का यह चक्र तब तक चलता है, जब तक मोक्ष न मिले। पांचवां है मोक्ष या मुक्ति का सिद्धांत: जन्म-मृत्यु के चक्र से पूर्ण मुक्ति। ब्रह्म में लीन होना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है। चार पुरुषार्थों में सबसे ऊंचा लक्ष्य है: मोक्ष, शेष हैं धर्म, अर्थ व काम। छठा सिद्धांत है अहिंसा परमो धर्म: यानी अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है। मन, वचन, कर्म से सभी प्राणियों में एक ही आत्मा को देखना और किसी के प्रति हिंसा न करना। सातवां है: सत्यं वद, धर्मं चर यानी सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो। यह महावाक्य तैत्तिरीय उपनिषद से लिया गया है। आठवां सिद्धांत है: अपने-अपने धर्म का आचरण करना। धर्म क्या है कर्तव्य, नैतिकता, न्याय। सामाजिक व्यवस्था के आधार हैं : व्यक्ति, परिवार, समाज और प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व। नौवां सिद्धात है: वसुधैव कुटुंबकम् यानी समस्त विश्व एक परिवार है। इसलिए सर्व प्राणियों में एकत्व की भावना। दसवां सिद्धांत है: एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति। सत्य एक है, विद्वान उसे अनेक नामों से पुकारते हैं। इसलिए शैव, वैष्णव, शाक्त, गाणपत्य, सौर अथवा स्मार्त आदि एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं। सनातन धर्म के अन्य महत्वपूर्ण सहायक सिद्धांत हैं: पंच महायज्ञ- देव, पितृ, भूत, मनुष्य और ब्रह्म यज्ञ- ये दैनिक जीवन के कर्तव्य हैं यम-नियम, जो पतंजलि योग सूत्र के अनुसार हैं : अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि। फिर हैं त्रिगुण यानी: सत्व, रज, तम। प्रकृति के ये तीन गुण, जो जीवन को प्रभावित करते हैं। संक्षेप में कहें, तो सनातन धर्म का सार है : एक परम सत्य की खोज, आत्मा की अमरता को समझना, कर्मों के अनुसार जीवन जीना और अंत में उस सत्य में लीन हो जाना या मोक्ष प्राप्त करना। यह कोई कठोर नियमावली नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है, जो व्यक्ति को स्वतंत्रता देता है कि वह अपने स्वभाव, समय और परिस्थिति के अनुसार अपना मार्ग चुन सके। भक्ति, ज्ञान, कर्म या योग-कोई भी रास्ता चुना जा सकता है। सनातन धर्म को मानने वालों को मार्गदर्शन देने के लिए आदि शंकराचार्य जी ने भारत में चार पीठों की स्थापना की थी। यही चारों शंकराचार्य सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्माचार्य हैं। इन्हें हजारों वर्षों से भगवान शंकर के रूप में पूजा जाता है। सभी संप्रदाय के आचार्य व अनुयायी सदियों से इन्हें अपने गुरु के रूप में सम्मान देते आए हैं। किंतु आज कई ऐसे भी मिल जाएंगे, जो स्वघोषित रूप से अपने नाम के पहले शंकराचार्य लगा लेते हैं, हालांकि उन्हें कोई शास्त्रीय मान्यता प्राप्त नहीं है। यह दुर्भाग्य है। किंतु सच यह भी है कि भारत की जनता ने सदैव आचरण को ही स्वीकार किया है। मुखौटा अधिक समय तक नहीं रहता है। यही नैतिकता की सर्वमान्य शक्ति है। -edit@amarujala.com

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Feb 10, 2026, 04:41 IST
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