छलका दर्द: आतंकवाद में खोए अपने, लेकिन अब तक सुविधाओं के लिए भटक रहे पीड़ित, क्या काम आएगी सरकार की ये पहल
पंजाब में आतंकवाद के दौर में हजारों परिवार ऐसे थे जिन्होंने अपनों को खो दिया। काफी पुलिस वालों ने आतंकियों से लोहा लेते हुए अपनी जान न्योछावर कर दी लेकिन ताज्जुब इस बात का है कि इनके आश्रित आज तक घोषित सुविधाओं के लिए भटक रहे हैं। सरकारों ने इन परिवारों को जो देने का वादा किया था वे अभी तक नहीं मिल पाया है। ये आश्रित आज अपने साथ पक्षपात रवैये का भी आरोप लगाते हैं। पंजाब में 32,514 आतंकवाद पीड़ित और 2046 पुलिस शहीदों परिवार हैं। मौजूदा सरकार ने इन पीड़ितों की समस्याओं के समाधान के लिए पहल की है। ऑल इंडिया टेररिस्ट विक्टिम एसोसिएशन व ऑल इंडिया माइग्रेंट फेडरेशन के प्रतिनिधिमंडल की एक बैठक पंजाब के राजस्व व पुनर्वास मंत्री हरदीप सिंह मुंडियां व अतिरिक्त मुख्य सचिव अनुराग वर्मा के साथ हुई। करीब एक घंटा चली इस बैठक में एसोसिएशन के चेयरमैन डॉ. बीआर हस्तिर और सतिंदर पाल सिंह सिद्धू ने पीड़ित परिवारों की समस्याओं व मांगों से उन्हें अवगत करवाया। बैठक में आतंकवाद पीड़ित आयोग गठित करने पर चर्चा की गई जिसके माध्यम से इन आश्रितों की समस्याओं का सरकारी स्तर पर समाधान किया जा सके। इस बारे में मंत्री मुंडियां मुख्यमंत्री से चर्चा करेंगे। बैठक में हुई इन मांगों पर चर्चा आतंकवाद में मारे गए लोगों के आश्रितों को 5 व पुलिस शहीदों के आश्रितों को 10 लाख रुपये वित्तीय मदद दी जाए। आयोग का गठन किया जाए, पेंशन एवं गुजारा भत्ता 6 हजार बढ़ाकर 10 हजार रुपये प्रति माह किया जाए। 23 जुलाई 2001 को तत्कालीन मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुए एक बैठक में आश्रितों के लिए कई घोषणाएं की गई थीं। साल 2002 के विधानसभा चुनाव की आचार संहिता की वजह से कई घोषणाएं लागू नहीं हुईं, उन्हें लागू करने की मांग। कुछ पीड़ित परिवारों को प्लॉट दिए गए मगर बहुत से रह गए, उन्हें प्लॉट देने की मांग। काफी पीड़ितों के पास रेड कार्ड नहीं है। उन्हें कोटे का लाभ भी नहीं मिल पाता। एक्सग्रेशिया रिवाइज्ड नहीं हुआ और बच्चों को भी योग्य अनुसार नाैकरी नहीं मिली। आंखों के सामने छह परिजन भून डाले आतंकवाद के दौर में दर्द झेलने वाले लोगों के जख्म आज भी हरे हैं। सुशीला नेगी के पिता गवर्नर हाउस में नौकरी करते थे। वे अपने परिवार के साथ ससुराल जा रही थी। लालड़ू के पास माता रिक्खी देवी, पिता मातवर सिंह, पति फतेह सिंह, बेटा विनोद व जगमोहन व बेटी गीता को बस में उसके सामने आतंकियों ने गोलियां ने भून दिया था। उन्हें भी गोलियों के छर्रे लगे मगर वे बच गई। 12 साल नौकरी की मगर पेंशन नहीं मिली। प्लॉट भी नहीं मिला आज भी किराये पर रह रही हैं।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Feb 06, 2026, 22:15 IST
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