चुनावों में विदेशी दखल: मस्क के फैसले से भारत में गर्माया मुद्दा, सियासत छोड़ देशहित में एकजुट हों राजनीतिक दल

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सरकारी खर्चे में कटौती के नाम पर अरबपति कारोबारी एलन मस्क के नेतृत्व में जिस सरकारी दक्षता विभाग का गठन किया है, उसके भारतीय चुनावों में मतदाताओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए दिए जाने वाले 2.1 करोड़ डॉलर का अनुदान रद्द करने के निर्णय ने भारत के चुनावों में विदेशी दखल का मुद्दा फिर से गर्मा दिया है। सियासी खींचतान तो खैर अपनी जगह है, लेकिन यह सवाल जरूर उठता है कि आखिर अमेरिका दूसरे देशों में लोकतांत्रिक भागीदारी को प्रभावित करने के लिए अपने करदाताओं का पैसा क्यों और कैसे खर्च करता है दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में हमेशा स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनावों की बात होती है, लेकिन हाल के वर्षों में चुनावी प्रक्रियाओं में विदेशी दखल की आशंका एक गंभीर मुद्दा बनकर उभरी है, जिसकी खबरें प्रत्यक्ष और परोक्ष, दोनों रूपों में सामने आई हैं। चाहे वह विदेशी सरकारों द्वारा वित्तपोषित प्रचार अभियान हो, डिजिटल माध्यमों के जरिये जनमत को प्रभावित करने के प्रयास हों या फिर कुछ राजनीतिक दलों को कथित तौर पर परोक्ष रूप से आर्थिक मदद मुहैया कराना। न्यूजक्लिक विवाद में कथित आरोप लगे कि इसे चीन से जुड़े स्रोतों से धन प्राप्त हुआ, जिसका उद्देश्य देश में सरकार विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देना था। लोकसभा चुनाव के वक्त माइक्रोसॉफ्ट ने डीपफेक व एआई के गलत उपयोग के जरिये चीन की तरफ से भारतीय चुनावों को लेकर खतरों के प्रति सचेत भी किया था। इस तथ्य को अलक्षित नहीं किया जा सकता कि अमेरिका ने चुनावों में मतदाताओं की भागीदारी बढ़ाने के नाम पर जो अनुदान रोका है, वह अब तक किसी न किसी के हाथ में तो जाता रहा ही होगा और किसी न किसी तरह यह खर्च भी होता रहा होगा। विदेशी हस्तक्षेप का अदृश्य हाथ न केवल चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करता है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी एक गंभीर खतरा है। लिहाजा जब तक विवरणों की जांच न हो, तब तक आशंकाएं तो बनी ही रहेंगी। इसमें संदेह नहीं कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की पवित्रता की रक्षा करके ही भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि विकास और तरक्की की उसकी राह विदेशी चालों के बजाय अपने ही लोगों की इच्छा से निर्देशित हो। ऐसे में जरूरी है कि सभी राजनीतिक दल देश की संप्रभुता और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता की रक्षा के लिए एकजुट हों। सरकार व चुनाव आयोग साइबर सुरक्षा व डिजिटल निगरानी बढ़ाएं और आम नागरिक इतने जागरूक तो बनें ही कि वे सोशल मीडिया पर फैलने वाली भ्रामक सूचनाओं के जाल में न फंसें।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Feb 18, 2025, 03:59 IST
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