Mandi News: भंडारत्री पर्व में जीवंत हुई पांगणा की लोक संस्कृति

करसोग (मंडी)। ऐतिहासिक नगरी पांगणा में मकर संक्रांति के लगभग एक सप्ताह बाद मनाया गया भंडारत्री पर्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं बल्कि लोक परंपरा, पारिवारिक एकता और स्वास्थ्य विज्ञान का जीवंत उदाहरण है। मां गौरा, भगवान शिव और गणेश को समर्पित यह पर्व शीत ऋतु के बीच सामाजिक सौहार्द और सांस्कृतिक विरासत को नई ऊर्जा दे रहा है।ऐतिहासिक नगरी पांगणा में बुधवार को भंडारत्री पर्व पारंपरिक श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। लोक पर्व में घर-घर धार्मिक अनुष्ठान हुए। इस दौरान पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू पूरे क्षेत्र को सांस्कृतिक रंग में रंग रही है। रसोईघरों में गरी के बुरादे, दाख (किशमिश) और सूखे मेवों से सजी गुझियां (प्राकें), बाबरु, भल्ले और भंडार बनाए गए। अनुष्ठानों के तहत सबसे पहले देवी-देवताओं, कुल देवता और ग्राम देवता को भोग अर्पित किया गया। इसके बाद अग्नि देव को आहुति दी गई और परिवार की सुख-शांति की कामना की गई। मां द्वारा बच्चों के माथे पर तिलक लगाया और दूध में परोसा गया भंडार बच्चों को खिलाया गया।धार्मिक परंपरा के अनुसार पति-पत्नी ने एक साथ भंडार को तोड़कर पहला टुकड़ा एक-दूसरे को खिलाया, जो दांपत्य जीवन में प्रेम और विश्वास का प्रतीक माना जाता है। इसके बाद परिवार के अन्य सदस्यों और रिश्तेदारों को यह प्रसाद वितरित किया गया है। इसके साथ ही बांडा देणा की परंपरा के तहत आस-पड़ोस और संबंधियों के घर जाकर बाबरु, प्राकें और भंडार बांटे गए। इससे सामाजिक समरसता बढ़ रही है और आपसी रिश्ते और अधिक मजबूत हुए।भागवत वक्ता डॉ. अमन शर्मा और रमेश शास्त्री का कहना है कि आधुनिक दौर में जब कई लोक पर्व धीरे-धीरे विलुप्त हो रहे हैं, ऐसे में भंडारत्री जैसे उत्सव पांगणा की सांस्कृतिक पहचान और पारिवारिक मूल्यों को जीवंत बनाए हुए हैं। उनका मानना है कि यह पर्व समाज को यह संदेश दे रहा है कि सच्ची समृद्धि केवल भौतिक नहीं, बल्कि परंपरा, स्वास्थ्य और रिश्तों में निहित हो रही है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jan 21, 2026, 23:43 IST
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