कुरुक्षेत्र: बाहरी धारणा या प्रचार से संगठन की नहीं समझी जा सकती वास्तविकता: डॉ. मोहन भागवत
समाज, संस्कृति, संस्कार, नैतिकता और श्रेष्ठ आचरण ही राष्ट्र निर्माण की मूल शक्ति हैं। नैतिक मूल्यों, संस्कारयुक्त जीवन और समाज के प्रति प्रतिबद्ध पुरुषार्थ का समन्वय ही स्वस्थ एवं संगठित समाज का आधार बन सकता है। संघ की कार्यपद्धति को समझना हो तो उसके कार्य में सहभागिता आवश्यक है, क्योंकि बाहरी धारणा या प्रचार से संगठन की वास्तविकता नहीं समझी जा सकती। यह विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत ने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के श्रीमद्भगवद् गीता सभागार में संघ शताब्दी वर्ष के अंतर्गत समाज परिवर्तन और हम विषय पर आयोजित गोष्ठी में व्यक्त किए। उन्होंने हर वर्ग के व्यक्ति के साथ मित्रता बनाने का संदेश दिया। कार्यक्रम में हरियाणा प्रदेश के शिक्षाविदों, सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारियों एवं सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने भाग लिया। मंच पर सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल बीएस जयसवाल, उत्तर क्षेत्र संघचालक पवन जिंदल तथा प्रांत संघचालक प्रताप सिंह उपस्थित रहे। सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत ने संघ की कार्यपद्धति के बारे में विस्तृत बताया और कहा कि संघ को समझना हो तो उसके कार्य में सहभागिता आवश्यक है, क्योंकि बाहरी धारणा या प्रचार से संगठन की वास्तविकता नहीं समझी जा सकती। उन्होंने बताया कि संघ के एक लाख तीस हजार से अधिक सेवा कार्य देशभर में संचालित हैं, लेकिन संघ स्वयं को सेवा या राजनीतिक संगठन के रूप में सीमित नहीं मानता। कला, क्रीड़ा, शिक्षा, समाज जीवन और विविध क्षेत्रों में कार्यरत स्वयंसेवक समाज परिवर्तन के वाहक हैं। इतिहास के संदर्भ में उन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम, क्रांतिकारी वासुदेव बलवंत फड़के तथा स्वतंत्रता आंदोलन की राष्ट्रभक्त परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्र निर्माण केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से संभव नहीं, बल्कि समाज संगठन और चरित्र निर्माण से होता है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Feb 28, 2026, 17:49 IST
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