पीजीआई का शोध: बच्चों के दिमागी संक्रमण पर बड़ी जीत, PGI ने खोजा सटीक और तेज पहचान का तरीका

चंडीगढ़ पीजीआई के डॉक्टरों ने बच्चों में होने वाले खतरनाक दिमागी संक्रमण एंटेरोवायरस एन्सेफलाइटिस की सटीक और समय पर पहचान का तरीका बेहतर बना लिया है। अब एमआरआई और आरटी-पीसीआर जैसी आधुनिक जांच तकनीकों की संयुक्त मदद से बीमारी की जल्दी पुष्टि संभव हो सकेगी। इससे इलाज समय पर शुरू कर बच्चों की जान बचाने की संभावना बढ़ेगी। अब तक स्थिति यह थी कि तेज बुखार, सिरदर्द, उल्टी, दौरे या बेहोशी जैसे लक्षण तो सामने आ जाते थे लेकिन यह पता लगाना मुश्किल होता था कि संक्रमण किस वायरस से हुआ है। कई बार सामान्य जांच रिपोर्ट स्पष्ट नहीं आती थी और डॉक्टरों को अनुमान के आधार पर इलाज शुरू करना पड़ता था। यह बीमारी खासतौर पर बच्चों को प्रभावित करती है और देरी होने पर जानलेवा भी हो सकती है। एमआरआई और आरटी-पीसीआर प्रभावी पीजीआई के रेडियोडायग्नोसिस एवं इमेजिंग, बाल रोग और वायरोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों ने मिलकर इस पर शोध किया। अध्ययन में पाया गया कि एमआरआई (मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग) और आरटी-पीसीआर (रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन पॉलिमरेज चेन रिएक्शन) का संयुक्त उपयोग संक्रमण की सही पहचान में बेहद प्रभावी है। इस शोध में डॉ. आकाश सेठी, डॉ. दीपांजलि शर्मा, डॉ. समीर व्यास, डॉ. मिनी पी. सिंह, डॉ. अरुण बंसल, डॉ. सरफराज अहमद, डॉ. चिराग कमल आहूजा, डॉ. नवीन संख्यान, डॉ. कपिल गोयल, डॉ. अर्नब घोष और डॉ. परमजीत सिंह शामिल रहे। यह शोध 5 फरवरी 2026 को इंडियन जर्नल ऑफ रेडियोलॉजी एंड इमेजिंग में प्रकाशित हुआ। इलाज की राह हुई आसान शोध में शामिल एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर के डॉ. अरुण बंसल ने बताया कि पहले हर केस में एमआरआई में शुरुआती बदलाव साफ नजर नहीं आते थे। वायरस की पुष्टि में देरी होने से इलाज प्रभावित होता था और कई मामलों में जटिलताएं बढ़ जाती थीं। उन्होंने सलाह दी कि बच्चों में तेज बुखार के साथ दौरे या व्यवहार में बदलाव दिखे तो तुरंत विशेषज्ञ से संपर्क करें। समय पर जांच से मस्तिष्क को स्थायी नुकसान से बचाया जा सकता है। ऐसे किया गया शोध अध्ययन में एक महीने से 12 वर्ष तक के 23 बच्चों को शामिल किया गया। संक्रमण की पुष्टि रियल-टाइम आरटी-पीसीआर से की गई और 3 टेस्ला एमआरआई मशीन से दिमाग की विस्तृत स्कैनिंग की गई। उन्नत तकनीकों से सूक्ष्म बदलावों की पहचान की गई। शोध में 56 प्रतिशत बच्चों में बेसल गैंग्लिया, 30 प्रतिशत में ब्रेनस्टेम प्रभावित पाया गया। कुछ मामलों में सेरेब्रल हिस्से और स्पाइनल कॉर्ड भी प्रभावित मिले। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में बच्चों के दिमागी संक्रमण के इलाज में महत्वपूर्ण साबित होगी।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Feb 24, 2026, 04:14 IST
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