Sirohi News: प्रकृति के मनोरम वातावरण के बीच यहां विराजे हैं पुष्करराज, जानिए क्या है इस मंदिर की खासियतें

गुजरात से सटे सिरोही जिले की ऐतिहासिक एवं प्राचीन धार्मिक स्थलों की वजह से देवनगरी के रूप में पहचान है। जिले में विभिन्न क्षेत्रों में एक से बढ़कर एक अतिप्राचीन मंदिर स्थित हैं। आज हम आपको ऐसे ही एक मंदिर के बारे में बता रहेहैं, जो सरूपगंज के समीप अरावली की पहाड़ियों एवं घने जंगलों के बीच स्थित है। इसे पुष्करराज तीर्थ भी कहा जाता है। यहां पहुंचने के लिए सरूपगंज टोल नाका के पास से सड़क मार्ग होते हुएपिंडवाड़ा तहसील के फूलाबाई का खेड़ा गांव पहुंचना होता है। बता दें कियहां से आगे की करीब पांचकिलोमीटर की दूरी नदी एवं पहाड़ियों में बनी पगडंडी से होकर तय करनी पड़ती है। बारिश एवं इसके बाद एक लंबे समय तक तो लोगों को कई बार पानी के बहाव के बीच में से होकर गुजरना पड़ता है। मंदिर के मुख्य द्वार से पुष्करराज मंदिर तक 100 सीढ़ियां भी चढ़नी पड़ती हैं, जो प्राकृतिक झरने के पास है। यह भी पढ़ें:लक्ष्यराज सिंह ने दी पिता को मुखाग्नि, महासतिया में किया गया अंतिम संस्कार यह है मंदिर की खासियतें वैसे तो पुष्करराज का नाम आते हीअजमेर का नाम हमारे दिमाग में आता है। लेकिन, सिरोही जिले में भी पुष्करराज का मंदिर है। मान्यता है कि जो लोग किन्हीं कारणों से अजमेर नहीं जा पाते हैं, वे यहां आकर दर्शन कर लेते हैं। उन्हें उसी के समान पुण्य लाभ मिलता है। मंदिर के प्रवेश द्वार के पास निरंतर बहती जलधारा और गोमुख इसे पवित्र बनाते हैं। इस मंदिर का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है। कुछ वर्ष पहले इसे जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पाया गया था, जिसके बाद साधु-संतों के सानिध्य में इसका जीर्णोद्धार करवाया गया था। यह भी पढ़ें:चिटफंड कंपनियों द्वारा ठगी की रिकवरी हेतु काउंटर खोलने की मांग, कुछ दिन पहले इतने दिन का समय दिया था यहां का आसपास का प्राकृतिक नजारा यहां आने वालों को शांति और सुकून प्रदान करता है। वाद्ययंत्र बजाती प्रतिमाओं से सज्जित मंदिर मंदिर के गर्भगृह में ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शिव की प्रतिमाएं विराजमान है। पंडाल में बने प्रत्येक पिलर और बाहरी दीवारों पर वाद्ययंत्र बजाती हुई प्रतिमाएं उकेरी गई हैं, जो इसे वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण बनाती हैं। यहां के महंत शिवगिरी महाराज मंदिर के प्रवेश द्वार पर विराजमान हैं, जबकि साधु-संतों के लिए कुटिया और निरंतर जलता हुआ धुणा भी परिसर बना हुआ है। शाम चारबजे के बाद मंदिर आवाजाही पर रहती है रोक चूंकि, ये मंदिर अरावली की सुरम्य पहाड़ियों के बीचों बीच स्थित है। इसलिए श्रद्धालुओं की हमेशा आवाजाही बनी रहती है। श्रावण मास में तो मंदिर में मेले सा माहौल हो जाता है। यहां आवाजाही के लिए घने जंगलों एवं पगडंडी से होकर गुजरना पड़ता है। ऐसे में अक्सर शाम को अंधेरा होने के बाद जंगली जानवरों का भी भय रहता है। इसलिए शाम चारबजे से सवेरे सातबजे तक मंदिर आने एवं यहां से जाने की मनाही है। श्रद्धालुओं को इस दौरान आवाजाही नहीं करने की सलाह दी गई है।

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Mar 17, 2025, 12:16 IST
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