होली का डांडा रोपा: जानिए गुलाबी शहर जयपुर की इस अनूठी परंपरा के बारे में; आज से मंदिरों में फागोत्सव शुरू
राजधानी जयपुर आज से फाग के रंग में रंग गई है। जयपुर के आराध्य गोविंद देव जी के मंदिर में आज से फागोत्सव शुरू हो गए हैं। इससे ठीक एक दिन पहले गोविंद देव जी के मंदिर में होली का डांडा भी रोप दिया गया। यह परंपरा जयपुर की स्थापना के समय से ही चली आ रही है। इसी परंपरा के अनुसार होली से ठीक 1 महीने पहले माघी पूर्णिमा पर होली का डांडा रोपा गया। क्या कहते हैं धर्माचार्य- पंडित विनोद शास्त्री पहले हर जगह गांवों में एक महीने पहले होली का डांडा रोपा जाता था। इसके बाद फिर होलिका दहन होता है। होली का डांडा भक्त प्रहलाद का प्रतीक होता है। डांडा रोपने का अर्थ है कि भक्त प्रहलाद की संस्थापना की गई है। उनकी, पूजा और अर्चना की जाती है। इसके साथ ही खुशहाली की कामना के लिए की जाती है। एक महीने पहले डांडा रोपने के पीछे धार्मिक परंपरा यह है कि कथाओं के अनुसार भक्त प्रहलाद को मारने के लिए षडयंत्र रचना शुरू हो गया था। होली दहन के लिए जो डांडा के चारो तरफ गोबर के बडूकले, झाड़-फूंस लगाए जाते हैं। वह होलिका के प्रतीक होते हैं और डांड भक्त प्रहलाद का प्रतीक। होली के दिन नवानेष्टी भी की जाती है। यानी इस दिन नया अन्न सेक कर खाया जाता है।
- Source: www.amarujala.com
- Published: Feb 13, 2025, 16:29 IST
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